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फ़्रांसीसी युद्धपोत का हॉर्मुज़र में प्रस्थान: भारत की समुद्री सुरक्षा पर बढ़ता सवाल
पिछले कुछ दिनों में फ़्रांस ने अपना एक युद्धपोत हॉर्मुज़र जलडमरूमध्य की तरफ बढ़ाया, जिससे क्षेत्र में संभावित रक्षा मिशन की संभावना बन गई। यह कदम, जो अमेरिकी प्रस्ताव पर इरान द्वारा पुनर्विचार के बीच आया, भारत के लिए कई रणनीतिक प्रश्न उठाता है।
हॉर्मुज़र एक रणनीतिक संकुचन है, जहाँ तेल का परिवहन लगभग 20% विश्व तेल आपूर्ति पर निर्भर करता है। इस जलमार्ग पर समुद्री सुरक्षा का प्रत्यक्ष असर भारत की ऊर्जा आयात लागत और समुद्री व्यापार पर पड़ता है। जबकि भारत ने पिछले वर्षों में इंडो‑पेसिफिक में अपना योगदान बढ़ाया है, फिर भी सरकार की इस क्षेत्र में असंगत देयताओं पर सवाल उठे बिना नहीं रह सकते।
विपक्षी दलों ने सरकार की मौजूदा समुद्री नीति को ‘अस्पष्ट’ और ‘अपर्याप्त’ कहा। उन्होंने मुद्दा उठाते हुए कहा कि मोदी सरकार ने कोचीन‑आधारित रणनीति अपनाते हुए, बहुराष्ट्रीय नौसैनिक सहयोग को केवल शब्दों तक सीमित कर रखा है, जबकि वास्तविक कार्य‑योजना का अभाव है। विशेष रूप से, भारतीय नौसेना की तैनाती की गति, क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ संयुक्त अभ्यास, तथा जलडमरूमध्य में भारत के रणनीतिक पोर्ट फेंसिंग पर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिखते।
फ्रांस और अमेरिका के बीच हुए इस संभावित सुरक्षा समझौते को लेकर इरान की समीक्षा भी भारत के लिये दोधारी तलवार बन कर उभरी है। एक ओर, एक मजबूत पश्चिमी नौसेना उपस्थिति से हॉर्मुज़र में शांति बनी रह सकती है, जिससे भारतीय तेल आयात सुरक्षित होगा। दूसरी ओर, यह दर्शाता है कि भारत को अपने स्वयं के रक्षा इन्वेस्टमेंट और सहयोगी गठबंधन को कैसे पुनःसंतुलित करना चाहिए, ताकि कोई भी बाहरी शक्ति क्षेत्रीय सुरक्षा को अपने हितों के लिए मोड़ न सके।
आर्थिक दृष्टिकोण से, हॉर्मुज़र में अस्थायी असुरक्षा भारत के तेल आयात पर 0.5%‑1% अतिरिक्त लागत का कारण बन सकती है, जो आय वर्गीय उपभोक्ताओं पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है। इस पर सरकार का स्पष्ट लागत‑ब्यौरा नहीं मिल पा रहा है, जिससे सार्वजनिक भरोसा घटता दिख रहा है। विपक्ष ने अनिवार्य रूप से औद्योगिक नीति में पारदर्शिता की माँग की है, यह तर्क देते हुए कि राष्ट्रीय हित में ‘गुप्त’ समझौते नहीं हो सकते।
राष्ट्र सुरक्षा की बात तक आते हुए, भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि भारत सभी मित्र देशों के साथ मिलकर समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तैयार है, परन्तु इस तरह के ‘डिफेंसिव मिशन’ में भारत को सक्रिय भूमिका नहीं दी गई। यह स्पष्ट करता है कि बाहरी ताकतों की पहल पर भारत अभी भी ‘सहयोगी’ रहने की हद तक सीमित है। इस संदर्भ में सरकार को सुझाव दिया गया है कि वह भारतीय नौसेना को आगे बढ़ाने के लिये बजट में अतिरिक्त 15% वृद्धि करे और साथ ही इंडो‑पेसिफिक क्षेत्र में कई द्विपक्षीय समुद्री अभ्यासों को सुदृढ़ करे।
सारांशतः, फ्रांसीसी युद्धपोत का हॉर्मुज़र की ओर रुख भारत की समुद्री सुरक्षा रणनीति के खामियों को उजागर कर रहा है। सरकार को अब नीतिगत अस्पष्टता को दूर कर, पारदर्शी योजना और विरोधी दृष्टिकोणों को समाहित करते हुए, राष्ट्रीय स्वार्थ को प्राथमिकता देनी होगी। तभी भारत इस जलडमरूमध्य में स्थायी शांति और आर्थिक स्थिरता की राह पर कदम रख पाएगा।
Published: May 7, 2026