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Category: राजनीति

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फ्रांसीसी नौसैनिक बल के मध्य‑पूर्वी दौरे से भारत की लाल सागर नीति पर सवाल

मंगलवार को फ्रांस की एक युद्धपोत ने लाल सागर की ओर प्रस्थान किया, जिससे भारत के लिए क्षेत्रीय सुरक्षा की गतिशीलता में नई जटिलताएं उत्पन्न हो गईं। इस कदम को कई विशेषज्ञों ने ‘हर्मुज़ मिशन’ के रूप में व्याख्यित किया, जहाँ यूरोपीय राष्ट्र अपने समुद्री व्यापार की सुरक्षा को लेकर मध्य‑पूर्व में सक्रिय भूमिका निभाने की इच्छा जताते हैं। उसी दिन, ईरान ने अमेरिकी प्रस्ताव की पुनः समीक्षा की घोषणा की, जबकि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस पहल को ‘युद्ध को समाप्त करने वाला’ कहा। इन घटनाओं ने भारत के विदेश तथा रक्षा नीति पर कई प्रश्न खड़े कर दिये हैं।

भारत का लाल सागर और फिरोज़गाद के आसपास का समुद्री क्षेत्र द्वितीय विश्व युद्ध से ही अंतरराष्ट्रीय व्यापार का हब रहा है। यहाँ से गुजरने वाले तेल तथा वस्तु प्रवाह का लगभग 20 % हिस्सा भारत के लिए सीधे आर्थिक महत्व रखता है। ऐसे में फ्रांसीसी नौसैनिक हस्तक्षेप को भारत के मौजूदा ‘इंडो‑पैसिफिक’ दृष्टिकोण के साथ तालमेल बिठाने की जरूरत है—परंतु सरकार ने अभी तक इस दिशा में कोई स्पष्ट रणनीतिक बयानों का प्रकाशन नहीं किया है।

विपक्षी बहुजन दल, विशेष रूप से कांग्रेस के विदेश मामलों के प्रमुख ने इस ‘अनिश्चितता’ को सरकार की ‘नीति‑असफलता’ का नमूना बताया। उन्होंने कहा, “जब तक भारत अपनी समुद्री सुरक्षा के लिए स्पष्ट ‘डिटेरेन्ट’ स्थापित नहीं करता, तब तक विदेशी नौसेनाओं का स्वतंत्र संचालन हमारे हितों को जोखिम में डाल देता है।” वहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा पर केंद्रित बीजिंग‑केन्द्रित विचारधारा को अपनाने वाले एएलपी ने यह तर्क दिया कि भारत को ‘ग्लोबल समुद्री साझेदारी’ में भाग लेना चाहिए, न कि केवल अपने ‘अकेले’ अनुसंधान पर भरोसा करना चाहिए।

दूसरी ओर, मोदी सरकार ने अभी तक इस विकास पर आधिकारिक संकेत नहीं दिया, जिससे जनता के बीच असंतोष पनप रहा है। सामाजिक मीडिया पर कई विश्लेषकों ने बताया कि भारत की ‘दुर्लभ’ डिप्लोमैटिक प्रतिक्रिया के पीछे मौजूदा ‘वित्तीय सीमाओं’ एवं ‘रक्षा बजट की प्राथमिकता‑परिवर्तन’ के कारण हो सकता है। जब तक सरकार स्पष्ट नीति‑भेद नहीं करती, तब तक अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह बने रहेंगे।

ईरान‑संयुक्त राज्य के बीच चल रहे वार्ता को लेकर ट्रम्प का “युद्ध खत्म” वाला बयान भी भारत के लिये दोधारी तलवार बन गया है। यदि प्रस्ताव सफल होता है, तो मध्य‑पूर्व में तनाव घटने से समुद्री सुरक्षा में कुछ राहत मिल सकती है; परंतु यदि यह वादे के पीछे ‘भूमिगत आर्थिक सहमति’ छुपा हो, तो भारत को फिर भी तेल के सुरक्षित परिवहन के लिए वैकल्पिक देनदारियों पर निर्भर रहना पड़ेगा। इस संदर्भ में, भारत के मौजूदा ‘हर्मुज़ म्यूनिशन’ समझौते की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठता है—क्या यह रणनीतिक ढांचा अब पुराना हो गया है?

अंतिम आँकड़ों के अनुसार, 2025‑26 में भारत के समुद्री व्यापार में 45 % भाग यहीं से गुजरता है। यदि फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों के जहाज़ बिना स्पष्ट भारतीय प्रतिबंध या सहयोग के इस क्षेत्र में प्रसारित होते हैं, तो भारत की समुद्री डोमेन‑प्रोटेक्शन नीति की पतरी नियोजनती ‘भ्रष्टाचार’ के आरोप लग सकते हैं। विरोधी दल इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि ‘परिपक्व नीति‑निर्धारण’ की कमी से ही ऐसा “राष्ट्रहित‑परक अनिश्चितता” उत्पन्न हो रहा है।

भविष्य में क्या भारत इस स्थिति का ‘सांझा’ समाधान निकाल पाएगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार विदेश मंत्री के मंच पर किन‑किन ‘संयुक्त समुद्री अभ्यासों’ को अपनाएगी और क्या वह अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा में ‘निर्णायक’ भूमिका निभाने का साहस रखेगी। संभावित विकल्पों में ‘सुरक्षा गठबंधन’ को सुदृढ़ करना, ‘डिज़िटल शिप ट्रैकिंग’ को लागू करना और ‘स्थायी औपनिवेशिक ट्रीटमेंट’ के रूप में ‘हर्मुज़ सुरक्षा परिषद’ में भारत को एक स्थायी सीट दिलाना शामिल हो सकता है।

अंततः, फ्रांसीसी जहाज़ की लाल सागर ओर गति, ईरान‑अमेरिका वार्ता और ट्रम्प की दावो‑प्रेरित बयानों ने भारत की विदेश नीति में मौजूदा ‘अस्पष्टता’ को उजागर कर दिया है। यह वही क्षण है, जब विपक्षी आवाज़ें और सार्वजनिक संघर्ष दोनों ही सरकार से ‘स्पष्ट दिशा‑निर्देश’ व ‘जवाबदेही’ की माँग कर रहे हैं। तभी भारत अपने समुद्री हितों को सुरक्षित रखते हुए, अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक ‘विश्वसनीय’ शक्ति के रूप में स्थापित हो सकेगा।

Published: May 7, 2026