जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: राजनीति

फ्रेंच ओपन में इनाम रक़म पर शीर्ष महिला टेनिस खिलाड़ियों का बहिष्कार संकेत: सरकार को नीति सुधार की जड़ता पर सवाल

बायेलोरुशियन टेनिस खिलाड़ी आर्या साबालेंका ने बुधवार को बताया कि फ्रेंच ओपन के पुरुषों‑की‑तुलना में महिलाओं के इनाम रक़म बहुत कम होने के चलते कई शीर्ष खिलाड़ियों को प्रतियोगिता से हाथ हटाने का विचार है। यह बयान न सिर्फ टेनिस जगत को हिला रहा है, बल्कि भारत के खेल नीति‑निर्माताओं के सामने एक कड़ी जाँच का मुद्दा भी लाया है।

साबालेंका के साथ कई अंतर्राष्ट्रीय महिला सितारे — जिनमें यूएसए की एश्ले बुड या ऑस्ट्रेलिया की एलेन वॉसिक — ने भी समान शिकायत दोहराई। उनका मुख्य तर्क है कि ग्रैंड स्लैम स्तर पर समान श्रम के लिए समान पारिश्रमिक मिलना चाहिए, जबकि फ़्रेंच ओपन में पुरुषों को $2.5 मिलियन और महिलाओं को केवल $1.4 मिलियन का इनाम मिलता है।

भारत में इस मुद्दे को गंभीरता से लिया गया, क्योंकि कई भारतीय महिला टेनिस खिलाड़ी, जैसे कि सानिया मले, ने सार्वजनिक तौर पर इस असमानता की निंदा की और सरकार से हस्तक्षेप की मांग की। सानिया ने कहा, “यदि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर न्याय नहीं मिलता, तो हमारे खिलाड़ियों का मनोबल टूटता है, और भारत में टेनिस की बुनियादी संरचना को नुकसान पहुँचता है।”

इसके जवाब में खेल मंत्रालय ने कहा कि टेनिस टूर्नामेंट की इनाम रक़म का निर्धारण स्वतंत्र संघों द्वारा किया जाता है, और भारतीय सरकार की भागीदारी सीमित है। मंत्री रजत शुक्ला ने कहा, “हम अंतर्राष्ट्रीय मानकों का सम्मान करते हैं, पर राष्ट्रीय खेल नीतियों में हमने समान वेतन सिद्धान्त को अपनाया है। विदेशी टूर्नामेंटों में बदलाव के लिए हमें अंतर्राष्ट्रीय टेनिस फेडरेशन (ITF) के साथ संवाद जारी रखना होगा।”

यह बयान विपक्षी पार्टियों को सन्तुष्ट नहीं करता। कांग्रेस के खेल मंत्री राजीव गुप्ता ने संसद में आपत्ति जताते हुए कहा, “देश की युवा प्रतिभा को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धा करने का अवसर तब ही मिलेगा जब सरकार न केवल बुनियादी सुविधा, बल्कि समान आर्थिक अवसर भी सुनिश्चित करे। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लैंगिक असमानता को देखते हुए, खेल मंत्रालय को सक्रिय रूप से इन मुद्दों को उठाना चाहिए।” अटल बिहारी वाद पार्टी (AAP) के सांसद अनीता तिवारी ने भी समान कथनी के साथ कहा, “यदि फ्रेंच ओपन में महिलाओं को समान इनाम नहीं दिया जा रहा, तो हमें अपने राष्ट्रीय टूर्नामेंट, जैसे कि डॉन बुखारी एपीए, में समानता लाने का संकल्प लेना चाहिए।”

पर्यवेक्षण समिति ने सुझाव दिया कि भारतीय टेनिस संघ (AIT) को अपने टॉप‑10 खिलाड़ियों के लिए न्यूनतम इनाम मानक स्थापित करना चाहिए, जिससे अंतर्राष्ट्रीय असमानता का असर घरेलू स्तर पर घटे। समिति ने यह भी कहा कि खेल मंत्रालय को खुले तौर पर एक ‘लैंगिक वेतन समानता नीति’ तैयार करनी चाहिए, जिसमें स्पॉन्सरशिप, मीडिया कवरेज, और टोकन इनाम ढांचे की समीक्षा शामिल हो।

वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि इस बहिष्कार की धमकी से केवल टेनिस ही नहीं, बल्कि भारत की कुल खेल नीति की विश्वसनीयता धूमिल हो सकती है। अगर विदेश में महिलाओं के प्रति ‘वेतन अंतर’ बना रहता है, तो संभावित निवेशकों और प्रायोजकों का भरोसा कम हो जाएगा। यह स्थिति भारतीय खेल राजदौर के मौजूदा ‘आधारभूत संरचना‑और‑प्रबंधन’ की विफलता को उजागर करती है।

आज के राजनीतिक परिदृश्य में इस मुद्दे को केवल खेल तक सीमित न रख कर, इसे लैंगिक समानता, आर्थिक न्याय और राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धात्मकता के व्यापक ढांचे में समझा जाना चाहिए। चाहे वह संसद में प्रश्नावली हो, या सार्वजनिक मंच पर बहस, यह स्पष्ट है कि ‘पुरुष‑महिला इनाम अंतर’ अब केवल टेनिस की नहीं, बल्कि पूरी राष्ट्र की नीति‑निर्माण की चुनौती बन चुका है।

Published: May 6, 2026