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Category: राजनीति

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पहले हज़ार दिनों में कुपोषण: सरकारी नीतियों का विरोधाभास और राजनैतिक दायित्व

शारीरिक विकास के सबसे संवेदनशील चरण—पहले तीन साल—में कुपोषण का असर शरीर, दिमाग और भविष्य की मानव पूँजी को बदल देता है। सरकार के आँकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 35 मिलियन बच्चे इस अवधि में पर्याप्त पोषण से वंचित हैं। यह संख्या न केवल स्वास्थ्य की समस्या बन गई है, बल्कि नीति‑निर्माण, प्रशासनिक जवाबदेही और चुनौतिपूर्ण राजनीतिक बहस का भी केंद्र बन गई है।

केन्द्रीय सरकार ने 2018 में पोषण‑अभियान (POSHAN Abhiyaan) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) को विस्तार से लागू किया, जबकि मध्याह्न भोजन योजना को सभी सरकारी स्कूलों में सुविधाजनक होने का दावा किया। लेकिन तोड़‑फोड़ के आँकड़े लगातार यह दिखाते हैं कि योजना की कवरेज और वास्तविक कार्यान्वयन के बीच बड़ी खाई है। कई राज्यों में भोजन वितरण में देरी, असंगत गुणवत्ता और लाभार्थियों की पहचान में त्रुटियां गवाही देती हैं कि “सर्वोच्च स्तर की नीति” अक्सर जमीनी स्तर पर टूट जाती है।

विपक्षी दलों ने इस lacuna को चुनावी मुद्दा बनाकर उठाया। विपक्षी नेता रामेश्वर दास ने संसद में सवाल उठाते हुए कहा, “यदि 35 मिलियन बच्चों को पोषण‑अभियान की देर से सूचना मिल रही है, तो यह सरकार की प्राथमिकताओं में गहरा भ्रम उजागर करता है।” उन्होंने कई राज्यों में केन्द्र सरकार के फंड के आधे हिस्से के अभी तक बंटे न होने की ओर इशारा किया, जिससे राज्य‑स्तर की योजनाएँ अधूरे पड़ रहे हैं।

ऐसे में प्रशासनिक जवाबदेही की कमी स्पष्ट है। कई रिव्यू रिपोर्टें बताती हैं कि खाद्य सुरक्षा विभाग के स्टाफ की कमी, लो‑लेवल डेटा एंट्री में त्रुटियां, और पोषण केंद्रों के लिये अपर्याप्त बुनियादी ढाँचा कुपोषण को रोकने में बड़े बाधायें हैं। यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि नीति‑ऊपर प्रबंधन की अनदेखी का परिणाम है, जो नागरिकों की भरोसे को कमजोर करता है।

सार्वजनिक हित के परिप्रेक्ष्य से यह सवाल उठता है कि क्या मौजूदा योजनाएँ “पहले हज़ार दिनों” के महत्व को समझती हैं या केवल आँकड़ों को सजाते हुए एक सतही समाधान पेश करती हैं। कई विशेषज्ञ तर्क देते हैं कि पोषक‑सवस्थापन को केवल भोजन प्रदान करने तक सीमित रखना असंगत है; मातृ स्वास्थ्य, गर्भावस्था की देखभाल और शुरुआती बचपन की शिक्षा को साथ‑साथ लाना आवश्यक है।

राजनीति के इस चरण में विवाद के दो ध्रुव स्पष्ट हैं: एक ओर, केंद्र और राज्य सरकारें अपने कार्यक्षेत्र को विस्तारित करने की कोशिश करती हैं, जबकि दूसरी ओर, विपक्षी दल और नागरिक समाज संगठन नीतियों की वास्तविक कार्यान्वयन को सवाल में डालते हैं। इस संघर्ष में मध्यम वर्ग और गरीब परिवार दोनों ही “कुपोषण‑संकट” के शिकार बने हुए हैं, जो न केवल स्वास्थ्य, बल्कि भविष्य की उत्पादकता और भारत की सामाजिक-आर्थिक प्रगति को भी प्रभावित करता है।

आगे की दिशा के लिये स्पष्ट रोडमैप की आवश्यकता है—डेटा‑संचालित मॉनिटरिंग, निधि के समय पर ट्रांसफ़र, और स्थानीय स्तर पर सुदृढ़ किचन‑नेटवर्क। यदि यह राजनीतिक इरादा और प्रशासनिक क्षमता के बीच समन्वय नहीं बनता, तो “पहले हज़ार दिनों” की कहानी देश की सबसे बड़ी असमानता को फिर से दोहराने का जोखिम उठाती है।

Published: May 6, 2026