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Category: राजनीति

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पहले-से-पहले मत‑गिनती पद्धति से बहु‑पार्टी भारत का प्रतिनिधित्व संकट

इस हफ़्ते घटित हुए स्थानीय और प्रादेशिक चुनावों ने भारतीय राजनीति के एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न को फिर से हल्का कर दिया — बहु‑पार्टी बहुलता को प्रथम‑पस्त‑द पथ (FPTP) प्रणाली में कैसे समुचित रूप से प्रतिबिंबित किया जाए। कई राज्यों में धड़ामे‑धड़ामे गठबंधन, छोटे दलों की अचानक उछाल और पारंपरिक दो‑मुखी ध्रुवीयता के बीच के अंतर ने दर्शाया कि वर्तमान वोट‑गिनती विधि आज की जटिल सामाजिक‑राजनीतिक तस्वीर को अनदेखा कर रही है।

यूनाइटेड किंगडम के स्थानीय परिषदों और स्कॉटिश‑वेल्श विधानसभाओं में समानांतर प्रवृत्तियों का जिक्र करना यहाँ महत्त्वपूर्ण है, जहाँ लािबर और कंज़र्वेटिव के बीच के द्विध्रुवीय संघर्ष के बाद छोटे‑छोटे दलों को पराजीत किया जा रहा है। इस वर्ष के चुनावों में रिप़ॉर्म यूके, ग्रीन पार्टी और वेल्श में Plaid Cymru ने अपने‑अपने क्षेत्रों में उल्लेखनीय सफलता पायी, जबकि लाबर को कई सीटों पर “सुरक्षित” रहने के कारण मतदाताओं के ‘वेस्टेड वोट’ की भावना झेलनी पड़ी। ये संकेत स्पष्ट करते हैं कि जब कई दलों के बीच प्रतिस्पर्धा तीव्र होती है, तो FPTP प्रणाली मतों को प्रभावी रूप में परावर्तित करने में विफल रहती है।

भारत में भी यह दृश्य दोहराने की संभावना बढ़ रही है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और केरल के कुछ क्षेत्रों में छोटे दलों और सवंकल्पित गठबंधनों ने प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों को डगमगाते दिखाया है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा‑कोष और कांग्रेस‑कोष के संघर्ष जारी है, राज्य‑स्तर पर कई बार गठबंधन सरकारें ही स्थिरता प्रदान कर पाती हैं। इस बहु‑पार्टी परिदृश्य में FPTP का प्रयोग करने वाले निर्वाचन परिणाम अक्सर ‘सुरक्षित सीटों’ में मतदाता निराशा, ‘ज्यादा मत‑पॉइंट’ के अनुकूल नहीं होते, तथा संभावित सहयोगी या विपक्षी आवाज़ों को पक्षपातपूर्वक बाहर कर देते हैं।

न्यायिक और विधायी स्तर पर कई विशेषज्ञों ने सुधार की माँग की है। बहुमत‑परिवर्तन (proportional representation) या मिश्रित‑प्रणाली (mixed-member proportional) जैसे विकल्पों को अपनाने से न केवल छोटे दलों को वैधता मिल सकेगी, बल्कि मतदाता सहभागिता भी बढ़ेगी। लेकिन यह प्रस्ताव वास्तविकता में कई बाधाओं से घिरा हुआ है: बड़े दलों की शक्ति संरचना, चुनावी खर्च में वृद्धि और संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता।

सरकार की ओर से अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है, जबकि विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को चुनावी जालसाज़ी के रूप में दर्शाते हुए, ‘वोट‑के‑अधिकार’ को बचाने के लिये सार्वजनिक चर्चा की माँग की है। सार्वजनिक क्षेत्र में भी इस प्रश्न पर तीव्र बहस चल रही है—क्या हमारे लोकतंत्र को बहुपक्षीय आवाज़ों के लिये खोला जाए, या फिर पारंपरिक दो‑ध्रुवीय प्रतिस्पर्धा को ही बनाए रखा जाए? यह सवाल भारतीय राजनीति के भविष्य को परिभाषित करेगा, क्योंकि मतदान की शक्ति तभी वास्तविक बदलाब लाएगी जब उसका निष्पादन न्यायसंगत और सभी वर्गों के लिए समावेशी हो।

Published: May 6, 2026