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पहला पारित हुए मत प्रणाली के तहत लोकतंत्र का नुकसान: चुनावी सुधार की तड़प
इंग्लैंड की वर्तमान प्रथम-परिपूर्ण-मत (FPTP) प्रणाली को लेकर बहस धीरे-धीरे भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में भी घुली है। ब्रिटेन में गार्डियन की स्तम्भकार पॉलि टॉयनबी ने बताया कि चाहे आज का चुनाव नतीजा जो‑ही हो, लोकतंत्र पहले ही हार चुका है क्योंकि मत‑गिनती का यह पुराना ढांचा सार्वजनिक विश्वास को क्षीण कर रहा है। यदि ऐसा सिद्धांत भारत में लागू किया जाए तो हमारे स्वयं के बहुपार्टी‑परिसर में वही समस्याएँ दोबारा उभर सकती हैं।
FPTP की सबसे सख़्त आलोचना यह है कि जीतने वाली पार्टी को मिलने वाला सत्ता‑अनुपात अक्सर उसकी वास्तविक लोकप्रियता से कई गुना अधिक हो जाता है। ऐसी स्थिति में कई मिलते‑जुलते वोट — जिनमें पाँच‑छह दलों के बीच केवल 10‑12 प्रतिशत का अंतर हो — एक ही सीट के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, पर परिणाम असंतुलित रहता है। इस असंतुलन ने यूके में अतीत में कई अजीब‑अजीब जीत‑हार की स्थितियों को जन्म दिया, जहाँ राष्ट्रीय स्तर पर निरंतर असंतोष की लहरें उठी।
भारतीय संदर्भ में बात करें तो अगले वर्ष के लोकसभा चुनाव में बहु‑दलीय प्रतिद्वंद्विता पहले से कहीं अधिक तीव्र दिख रही है। सर्वेक्षणों के हिसाब से प्रमुख पाँच‑छह राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों के बीच मतों का अंतर 8‑15 प्रतिशत के भीतर है। ऐसी निकटता में यदि हम वही FPTP मॉडल अपनाएँ, तो छोटे तथा मध्यम दलों के मत‑वोटों का असर बहुत कम रहेगा, जबकि बड़ी दलों को अप्रत्यक्ष रूप से ‘अधिकतम’ सत्ता मिलेगा। इससे न केवल प्रतिनिधित्व की वैधता पर सवाल उठेगा, बल्कि चुनावी प्रतिकूलताओं को दोबारा दोहराने का जोखिम भी बना रहेगा।
वहीं, प्रपोर्शनल प्रतिनिधित्व (PR) की ओर झुकी हुई धारा कई संकेत देती है कि सुधार की गूँज कहीं न कहीं सुनाई दे रही है। स्कॉटलैंड और वेल्स में पहले ही PR को अपनाकर वैधता‑संबंधी समस्याओं को कम करने की दिशा में कदम बढ़ाए गए हैं। भारतीय लोकतांत्रिक विचारकों ने इस मॉडल को ‘वोट‑की‑सही‑कीमत’ के रूप में सराहा है, क्योंकि यह प्रत्येक पार्टी को उसके वास्तविक वोट‑शेयर के अनुपात में सीटें देता है। ऐसी प्रणाली से न केवल छोटे दलों की भागीदारी बढ़ेगी, बल्कि राजनैतिक बहस में विविधता और नीति‑निर्णय में संतुलन भी आएगा।
इस बीच, सरकार पक्ष और विपक्ष की प्रतिक्रियाएँ भी परस्पर विरोधी हैं। सरकारी प्रवक्ता ने कहा है कि FPTP भारत की ‘जटिल सामाजिक बुनियाद’ को संभालने में सक्षम है, जबकि विपक्षी दलों ने कहा है कि यह प्रणाली ‘लोकतांत्रिक वैधता को कम कर रही है’ और ‘वोटर की आशा को तोड़ रही है’। कुछ प्रादेशिक नेता ने आधिकारिक तौर पर PR मॉडल को ‘विकास‑और‑समानता का द्वार’ कहा है, परन्तु इससे जुड़ी विधायी जटिलता और संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता को लेकर अभी भी गहरी अनिश्चितताएँ बनी हुई हैं।
यदि हम इस मुद्दे को केवल मतदान प्रक्रिया तक सीमित रखें, तो गंभीर प्रश्न अनदेखा रहेंगे: क्या लोकतंत्र को गहन विश्वास‑संकट से बचाने के लिए हमारी संसद को फिर से डिजाइन करना आवश्यक नहीं? क्या बहुसंख्यक‑नीति‑निर्धारण को रोकने के लिए ‘वोट‑की‑सही‑कीमत’ को अपनाना अनिवार्य है? इन प्रश्नों के उत्तर में ही भारतीय राजनैतिक व्यवस्था का भविष्य तय होगा।
साफ़ शब्दों में कहा जाए तो पहला पारित हुए मत प्रणाली, चाहे वह यूके में हो या भारत में, तब तक समस्याग्रस्त रहेगी जब तक वह बहुपार्टी‑लोकतंत्र की वास्तविक अभिव्यक्ति नहीं बन पाती। जैसा कि टॉयनबी ने इंगित किया, अगर अभी बदलाव नहीं आया, तो ‘लोकतंत्र ही हार सकता है’। यही दुविधा भारतीय लोकतांत्रिक संस्थानों से अब भी पूछती है: सुधार की घड़ी अभी भी बज रही है या चुप्पी का सिला मिल रहा है।
Published: May 7, 2026