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प्रधानमंत्री की युद्ध‑नीति में दोलन से विरोधी नेता भी असंगत हो रहे हैं
बीते सप्ताह भारत सरकार ने मध्य‑पूर्व में चल रहे संघर्ष के संबंध में कई बार अपने रुख को बदलते हुए प्रस्तुत किया। पहले एक मजबूत समर्थनात्मक बयान दिया गया, फिर एक मध्यस्थता‑आधारित शांति प्रस्ताव का उल्लेख किया गया, और फिर फिर से रणनीतिक भागीदारी पर ज़ोर दिया गया। इस असामान्य परिवर्तनशीलता ने जनसंचार में भ्रम पैदा किया, और यह स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रपति के करीबी सलाहकारों के बीच भी सहमति नहीं बन पाई है।
प्रधानमंत्री के ये उतार‑चढ़ाव न केवल विदेश नीति की पूर्वानुमेयता को चुनौती देते हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा विभाग के भीतर निर्णय‑प्रक्रिया की कमजोरियों को भी उजागर करते हैं। कई राजनयिक विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी अनिश्चितता विदेशियों के भरोसे को घटा सकती है, साथ ही भारत की रणनीतिक भागीदारियों पर सवाल खड़े कर सकती है।
विरोधी दल के वरिष्ठ नेता राजीव राव, जो विदेश मामलों में अपनी बारीकी के लिये जाने जाते हैं, ने इस स्थिति को ‘हितैषी और असंगत’ कहा। राव ने कहा कि “एक ही सरकार के भीतर इतने बार नीतियों को पलटना, अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की विश्वसनीयता को क्षीण करेगा”। उनका यह प्रतिक्रिया दर्शाता है कि यहाँ तक कि पारम्परिक विरोधियों को भी अब सरकार की झटका‑भरी संचार रणनीति से असहजता महसूस हो रही है।
सरकारी अभिव्यक्तियों के क्रमिक परिवर्तन का प्रतिवाद करने के लिए जानकारी के अभाव में कई मंत्रालयों ने अपनी प्रतिक्रियाएँ सीमित रखी हैं। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि “देश के राष्ट्रीय हितों के अनुरूप, सभी निर्णय मौजूदा तथ्यात्मक परिस्थितियों के आधार पर पुनः परखे जाते हैं”। यह सामान्य टिप्पणी, हालांकि, राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के भीतर निर्णय‑संगठन की स्पष्टता की कमी को और उजागर करती है।
आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों पर भी इन नीतियों के परोक्ष प्रभाव पड़ने की आशंका व्यक्त की जा रही है। यदि विदेश में किसी भी बड़े संघर्ष में आंतरिक सहमति नहीं बन पाती, तो भारतीय कंपनियों, विशेषकर ऊर्जा और रक्षा उद्योग, को निवेश के माहौल में अनिश्चितता का सामना करना पड़ेगा। सार्वजनिक हित की दृष्टि से यह स्थिति विशेष रूप से चिंता का विषय है, क्योंकि विदेश नीति का प्रत्यक्ष असर घरेलू विकासशील योजनाओं पर भी पड़ता है।
परिणामस्वरूप, संसद में इस विषय पर सवाल उठाने की संभावना बढ़ गई है। विपक्ष के कई सांसद पहले ही प्रश्न पत्र तैयार कर चुके हैं, जिसमें नीति‑संगठन, निर्णय‑परामर्श के औपचारिक प्रोटोकॉल, तथा विदेश में भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर स्पष्ट मार्गदर्शन की मांग की जाएगी। यह दिशा‑निर्देशों का अभाव, यदि जल्द ही सुधारा नहीं गया, तो सरकार को लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से बचते हुए ‘रणनीतिक भ्रम’ के लेबल से चिह्नित किया जा सकता है।
Published: May 7, 2026