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नगरपालिका चुनाव के मोर्चे पर आवास संकट: मतदाताओं की प्राथमिकता
गुरुवार को निर्धारित नगरपालिका चुनाव में आवास संबंधी समस्याएँ मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंता बन कर उभरी हैं। शहर के कई वार्डों में किराए में लगातार बढ़ोतरी, पुरानी इमारतों की हालत ख़राब और सस्ते आवास परियोजनाओं की विलंबित कार्यवाही ने नागरिकों को असहज स्थिति में डाल दिया है।
शासन पक्ष ने पिछले दो सालों में ‘सस्ती आवास योजना’ के तहत 12,000 इकाइयों का निर्माण करने का लक्ष्य रखा था, परंतु आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि अब तक केवल 4,500 इकाइयाँ ही पूरी हो पाई हैं। बाकी मौजूदा आयोजनें बजट निकासी, भूमि विवाद और अनियोजित पंजीकरण में अटकती दिख रही हैं। इस कारण से कई मध्यम वर्ग के परिवारों को किराये के बोझ से जूझना पड़ रहा है, जबकि शहरी गरीबों को झुग्गी‑बस्ती से बाहर निकलने का कोई ठोस रास्ता नहीं दिखता।
विपक्षी दलों ने सरकार की यह धीमी प्रगति ‘निश्चिंत वादे और वास्तविक क्रियान्वयन में अंतर’ कहा है और उन्होंने चुनावी मंच पर आवास उपलब्धता, किराया नियमन तथा बुनियादी बुनियादी ढाँचे के लिए सख़्त समय‑सीमा की मांग की। कुछ स्थानीय सांसदों ने शहरी विकास प्राधिकरण को ‘जिम्मेदारियों से बचने’ का आरोप भी लगाया, जबकि नागरिक संगठनों ने इस मुद्दे पर व्यापक मतदान‑पूर्व प्रदर्शन किया है।
आवाज उठाने वाले समूहों का कहना है कि केवल नई इमारतें नहीं, बल्कि मौजूदा आवासीय इकाइयों के रख‑रखाव, जल‑स्वच्छता और उचित सार्वजनिक परिवहन की भी व्यवस्था आवश्यक है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि अगले चुनाव में मतदान के बाद भी इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो नगरपालिका शासन की विश्वसनीयता पर गहरा असर पड़ेगा।
रायुक्त चयन आयोग ने यह संकेत दिया है कि आवास समस्या पर स्पष्ट और पारदर्शी डेटा प्रस्तुत करना चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिए अनिवार्य होगा। इसी बीच, चुनाव अभियान पर चल रही इस बहस ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक दावों और नीतियों की वास्तविकता के बीच का अंतर अब और नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
Published: May 6, 2026