नीति निर्माताओं को हरित बदलाव में गति देनी होगी: यूके चुनावी परिदृश्य की सीख
वैश्विक जलवायु परिवर्तन के बीच, यूके के चारों प्रमुख राजनीतिक दलों की ऊर्जा नीतियों पर हो रही तीव्र टकराव ने यह दिखा दिया है कि जलवायु लक्ष्य की ओर गति नहीं बढ़ाने से चुनावी अस्थिरता ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक भरोसे का गिरावट भी संभव है। हालिया ब्रिटिश चुनावों में, प्रमुख पार्टियों के बीच शुद्ध शून्य (नेट ज़ीरो) और नवीकरणीय ऊर्जा के प्रश्न ने पारंपरिक वर्गीकरण को धुत किया।
कंजरवेटिव पार्टी, जो लंबे समय तक जलवायु लक्ष्य के प्रमुख समर्थक के रूप में देखी जाती थी, अब नेट ज़ीरो के प्रति अपना समर्थन घटा रही है। इस बदलाव को कई विश्लेषकों ने ‘विचारधारा‑के‑बाहर’ की प्रवृत्ति के रूप में पढ़ा है, जिसमें ख़र्च‑भारी सौर‑पवन प्रोजेक्ट्स को ‘आर्थिक बोझ’ कहा जा रहा है। इसके उलट, छोटे‑से‑पार्टियों में से एक, रिफॉर्म यूके, ने नवीकरणीय ऊर्जा को सीधे विरोधी के रूप में निशाना बनाया है, जिससे जलवायु‑संबंधी चर्चाएँ चुनावी रैलियों की जगह तेज़ विरोधी सामग्रियों में बदल गई हैं।
स्कॉटिश और वेल्श स्तर पर स्थितियों में भी समान तीक्ष्णता देखी गई। स्कॉटिश संसद में, केवल ग्रीन पार्टी ने जलवायु‑सुरक्षा के नाम पर नई तेल‑गैस निकासी के खिलाफ स्पष्ट रुख रखा, जबकि स्कॉटिश नेशनल पार्टी (SNP) ने पूर्व में रॉज़बैंक तेल‑क्षेत्र के विरोध को कुछ हद तक नरम किया, जिससे यह संकेत मिला कि आर्थिक‑राजनीतिक दबाव नीति‑निर्धारण को प्रभावित कर रहा है। उसके विपरीत, स्कॉटिश लेबर ने नयी परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को समर्थन दिया, जिसे उन्होंने ऊर्जा स्थिरता के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया।
इन विभाजनों को देखते हुए, भारत को अति‑सावधानी से इन प्रतिबिंबों को पढ़ना चाहिए। हमारे देश में भी मौसमी जलवायु‑संकट, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। आगामी राष्ट्रीय एवं राज्य‑स्तर के चुनावों में, जलवायु नीति के अभाव में ‘आर्थिक बोझ’ का तर्क कई बार सत्ता‑स्थापना को मोड़ सकता है, जबकि विरोधी दल इस बात का प्रयोग करके सत्ता‑विरोधी नारे बुन सकते हैं।
गुजरात, तमिलनाडु और पंजाब में ऊर्जा‑संकट की चुनौतियाँ साफ‑साफ दिखाती हैं कि नवीकरणीय ऊर्जा को न केवल बड़े‑पैमाने पर, बल्कि घर‑घर तक पहुंचाना आवश्यक है। अगर सरकार अपने ‘ग्रीन ट्रांज़िशन’ के दावों को वास्तविकता में बदले नहीं, तो सार्वजनिक हित के प्रश्न उठेंगे: क्या घटते कोयला‑राज्य के कामगारों के लिए पुनः‑प्रशिक्षण योजनाएँ मौजूद हैं? क्या सौर‑पैनल सब्सिडी के लाभ वास्तव में छोटे‑उपभोक्ताओं तक पहुँच रहे हैं? क्या नवीकरणीय ऊर्जा के विकास में पारदर्शी अनुबंध और पर्यावरणीय मानकों की गंभीरता बनी रहेगी?
समग्र रूप से, यूके का केस यह साबित करता है कि चाहे वह विकसित राष्ट्र हो या विकासशील, जलवायु‑नीति में अस्थिरता चुनावी अनिश्चितता और समाजिक असंतोष को जन्म देती है। भारतीय नीति‑निर्माताओं को इस संकेत को ध्यान में रखते हुए, न केवल राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि जन‑जन तक जलवायु‑सुधार की गति तेज करनी होगी—वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के सुदृढ़ ढाँचे, घर‑घर नवीकरणीय समर्थन, और आर्थिक‑सामाजिक रूप से पुनर्संरचना योजनाओं के साथ। तभी ‘हरित बदलाव’ का दावों से कहीं अधिक वास्तविक रूप में रूपांतरण संभव होगा।
Published: May 4, 2026