थैचर के निजीकरण के विरुद्ध पलटाव: भारतीय राजनीति में संभावित वोट‑विनिंग मुद्दा
बेटियों‑बेटों, 1987‑की गर्मियों में, जब भारत‑वर्ल्ड के कई युवा, मैन हेल्थ, कुटुंब निर्माण जैसे बुनियादी आशाओं में लगे थे, वहीं ब्रिटेन में मार्गरेट थैचर का ‘पीपल्स कैपिटलिज़्म’ तेज़ी से धुंधला हो रहा था। ब्रिटिश गैस, पानी और ऊर्जा जैसे सार्वजनिक खजाने को निजी हाथों में बेचने के लिये ‘टेल सिड’ नामक विज्ञापन अभियान ने मध्यम वर्ग को “कामगारों को अमीर बना दे” का वादा किया। इस पाखंड को समझने के लिये एक साधारण बिजली मिस्त्री के सहायक की कहानी मददगार है, जो स्वयं को ‘उपयोगी नहीं’ मानते हुए भी नौकरी के दौरान बॉस को डिली सेगीत गाने गाते रहे।
वह सहायक, अपने बॉस के साथ टूल‑बॉक्स वाले छोटे‑छोटे संवादों में, थैचर की नीतियों पर चर्चा करता था। उनका बॉस, स्टुअर्ट, ‘टेल सिड’ अभियान के उत्तरदायी में से एक था – उन्होंने नव‑निजीकृत ब्रिटिश गैस के शेयर खरीदे और ‘आइडलिस्टिक’ विचारों में डूबे कि भविष्य में कामगार भी कंपनी के शेयरधारक बनेंगे। वास्तविकता अलग थी। शेयरों की कीमतों में उतार‑चढ़ाव, प्रबंधन के निजी लाभ‑प्राथमिकता और सार्वजनिक सेवाओं की लागत में बढ़ोत्तरी ने कई निचले‑सिन्धु के घरों को आर्थिक दबाव में डाल दिया। यह ‘धन‑संपन्न’ ध्वनि केवल एक विज्ञापन का झूठा प्रतिध्वनि थी।
आज भारत में वही धुंधला परिदृश्य दोहराया जा रहा है। पिछले दो दशकों में हवाई यात्रा, दूरसंचार, जल तथा सशक्तिकरण क्षेत्रों में सरकारी इकाइयों का निजीकरण किया गया, अक्सर ‘डिज़ाईन‑टू‑ड्रैन’ मॉडल के तहत, जहाँ लाभ‑उपरांत मूल्य में वृद्धि जनता के खर्चे पर हुई। विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस और कुछ प्रादेशिक पार्टियों ने इस नीतियों को ‘थैचर के असफल प्रयोग’ की तरह लेबल किया और इसे उलटने की घोषणा की। चुनावी घोषणा‑पत्रों में ‘सार्वजनिक संपत्ति का पुन:स्वामित्व’ और ‘निजीकृत सेवाओं की पुनर्गठन’ जैसे बिंदु शामिल हैं, जिससे संभावित वोट‑विनिंग आँच बढ़ी है।
सरकार की ओर से, इस समय कोई ठोस आंकड़ा नहीं दिया गया है कि पिछले दो दशकों में निजीकरण से किस हद तक ‘राष्ट्रीय धन’ में वृद्धि हुई, न ही यह बताया गया है कि सार्वजनिक सेवाओं की पहुँच में कोई सुधार हुआ है। आलोचनात्मक आवाज़ें, जो प्रमुख विशेषज्ञों और नागरिक समूहों से आती हैं, तर्क देती हैं कि जब तक लाभ‑उपरांत मूल्य नियंत्रण नहीं होगा, ‘अर्थ‑संकट के वादा’ केवल चुनावी उपहास बन कर रहेगा।
राजनीतिक संदर्भ में, इस मुद्दे को उठाने से विपक्ष के लिये कई लाभ हैं। पहली बात, यह एक सहज राष्ट्रीय भावना को छेड़ता है – ‘सामान्य जनता के हक़ का पुनःस्थापन’। दूसरी बात, वर्तमान सरकार के ‘आधिकारिक जवाबदेही’ को चुनौती देकर, विपक्ष यह दिखा सकता है कि वह ‘विपरीत दिशा में कदम रखने के साथ-साथ व्यावहारिक नीति‑निर्धारण’ कर सकता है। यह छत्र विडंबनात्मक रूप से थैचर के कई साल पहले के ‘धन‑सुगंधी’ विज्ञापनों को भारत के ‘कदम‑पर‑कदम सही’ बैनर के नीचे उलटता है।
अंत में, यह स्पष्ट है कि थैचर के निजीकरण का इतिहास केवल ब्रिटेन के राजनीतिक परिदृश्य में नहीं, बल्कि वैश्विक नीति‑निर्माण में एक संकेतक के रूप में कार्य करता है। भारत में इस इतिहास को पुनः पढ़कर, विपक्ष के लिये एक ठोस वोट‑विनिंग कहानी तैयार की जा सकती है – बशर्ते वह केवल ‘उलटने की बात’ न रखे, बल्कि पुनः‑स्वामित्व, नियंत्रण और सार्वजनिक हित की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करे। तभी यह ‘कामगार को अमीर बनाओ’ का पुराना ध्वनि, नई भारतीय लोकतांत्रिक वास्तविकता में औचित्य स्थापित कर सकेगा।
Published: May 5, 2026