थाई 'लुक नू' रॉकेट उत्सव: विदेश में सांस्कृतिक शोभा, भारत की नीति‑खेमे में धुंधले प्रतिबिंब
पिछले सप्ताह थाईलैंड के कई मठों ने वार्षिक ‘लुक नू’ रॉकेट महोत्सव का आयोजन किया, जिसमें प्राचीन मोन परंपरा के तहत रॉकेट फेंके गये। यह समारोह स्थानीय समुदायों के बीच सौहार्दपूर्ण प्रतिस्पर्धा के स्वरूप में आयोजित हुआ, जहाँ विभिन्न मंदिरों ने अपने‑अपने रॉकेट की ऊँचाई और सजावट के आधार पर प्रशंसा अर्जित की।
इतने ही में इस घटना को भारतीय मंच पर राजनीतिक चर्चा का ब्योरा बना दिया गया। मोन संस्कृति की इस प्रदर्शनी को भारत के विदेश मंत्रालय ने “दक्षिण‑पूर्व एशिया के सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा” कहा, और इसे भारत‑थाई सहयोग के संकेत के तौर पर प्रस्तुत किया। वहीं, विपक्षी दल इस पर सवाल उठाते हुए तर्क देते हैं कि सरकार विदेश में ऐसे परिदृश्यों को सराहते‑सराहते घरेलू स्तर पर मौजूदा सांस्कृतिक लोकोत्तर एवं पर्यटन‑अवसरों को अनदेखा कर रही है।
मुख्य विपक्षी नेता ने कहा, “जब तक हमारे गाँव‑गाँव में पिचकारी, नौका‑जोतिया और लोक‑नृत्य के लिये न्यूनतम बजट नहीं मिलता, तब तक विदेशी रॉकेट महोत्सव की प्रशंसा में कोई सच्ची राष्ट्रीय भावना नहीं बनती।” यह बयान इस समय के बीच‑चुनावी माहौल में और अधिक तैर रहा है, जहाँ कई राज्य सरकारें अपने‑अपने सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिये अनेक धनराशि आवंटित करने का वादा कर रही हैं।
सत्ता पक्ष के प्रवक्ता ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक उत्सवों में भागीदारी भारत की ‘सॉफ्ट‑पावर’ रणनीति का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि विदेश में थाई समुदाय द्वारा रखी गई परंपरा, भारत के कई पूर्वज समुदायों, विशेषकर नागा, सान्ताल और लिपु जैसे जनजातीय समूहों के साथ सांस्कृतिक संगतियों को दर्शाती है। लेकिन इस दावों के पीछे असली सवाल बनता है—क्या विदेश मंत्रालय के बजट में वह भाग दिखाई देता है जो ग्रामीण भारत में अछूते मंदिरों, शास्त्रीय संगीत संस्थानों और स्थानीय कारीगरों को समर्थन दे सके?
नीति‑प्रभाव के संदर्भ में विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी अंतरराष्ट्रीय कवरेज सरकार को दो‑धारी तलवारा देती है। एक ओर, यह विदेश में भारत की छवि को चमकाता है; दूसरी ओर, यह घरेलू स्तर पर ‘सांस्कृतिक विकास’ के वादे को प्रश्नवाचक बनाता है। भारत में कई धरोहर‑स्थलों की भूल‑भुलैया जैसी स्थिति, अनियमित रूप से सूखती जलसेनाएँ और संरक्षण‑कोष की कमी, इस बात को उजागर करती है कि विदेशी उत्सवों पर ध्यान देना केवल राजनीतिक दिखावे से आगे नहीं बढ़ता।
इस बीच, पर्यटन विभाग ने थाई ‘लुक नू’ उत्सव को “वर्ष 2026 में भारतीय पर्यटकों के लिये प्रमुख आकर्षण” के रूप में सूचीबद्ध किया है, जिससे संभावित आर्थिक लाभ की झलक मिलती है। परंतु, इस आकांक्षा के साथ जुड़ी अपेक्षाएँ यह भी मांगती हैं कि सरकार ग्रामीण एवं छोटे शहरों में समान रूप से निवेश करे, ताकि विदेश में देखी गयी रॉकेट‑उत्सव जैसी चमक हमारे अपने मन्दिरों की घंटी में भी गूँज सके।
Published: May 6, 2026