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Category: राजनीति

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त्रम्प के ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ में उलझन: भारत की समुद्री नीति फिर से सवालों के घेरे में

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल ही में ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ की घोषणा की—एक ऐसी ऑपरेशन जिसका उद्देश्य एक प्रमुख समुद्री मार्ग में फँसे जहाजों को सुरक्षित रूप से पास कराना था। लेकिन घोषणा के दो हफ्ते बाद ही इस योजना को अनिश्चितकालीन रुका कर दिया गया। इस अचानक रुकावट ने न केवल अमेरिकी विदेश नीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए, बल्कि भारत के समुद्री रणनीति और सुरक्षा‑ब्यापी समीक्षाओं को भी तेज कर दिया।

भारत सरकार ने त्वरित बयान में कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों की खुली पहुँच देश के व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यावश्यक है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि वे अमेरिका के साथ मिलकर इस मुद्दे को समझेंगे, पर ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ की अस्थायी ठप्पी पर “विचार‑विमर्श जारी रहेगा”। इसी परिप्रेक्ष्य में, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार कार्यालय ने संकेत दिया कि यदि अमेरिकी पहल में अनिश्चितता रहेगी तो भारत को अपने वैकल्पिक वैरायटी रूट्स—जैसे कि अदर द्वीप शृंखलाओं के माध्यम से माल ढुलाई—को तेज़ करने की जरूरत पड़ेगी।

विपक्षी दलों ने इस अवसर का फायदा उठाते हुए सरकार की ‘जॉइंट ऑपरेशन’ की तैयारी पर प्रश्न उठाया। कांग्रेस और बJP के प्रमुख नेताओं ने कहा कि सरकार ने अमेरिकी नीतियों पर भरोसा करके भारत की समुद्री स्वतंत्रता को जोखिम में डाल दिया है। कई सांसदों ने संसद में ‘समुद्री सुरक्षा विधेयक’ पेश करने का प्रस्ताव रखा, जिसमें विदेशी सैन्य हस्तक्षेप के प्रति कड़ी निगरानी का प्रावधान होगा।

नजदीकी आम चुनावों के ठेंक में, इस विषय का उपयोग कई राजनीतिक दलों ने किया है। कुछ राज्यों में विपक्ष ने घोषणा की कि यदि सरकार ‘बाहरी शक्ति’ के निर्भर रहने की दिशा में कदम बढ़ाएगी तो वह ‘राष्ट्रहित विरोधी’ के रूप में सामने आएगी। दूसरी ओर, सरकार ने कहा कि “अमेरिकी पहल में किसी भी प्रकार की बाधा का असर भारतीय व्यापार पर नहीं पड़ेगा, क्योंकि भारत के पास वैकल्पिक समुद्री मार्ग पहले से ही तैयार हैं।” यह बयान कई आर्थिक विशेषज्ञों ने आंशिक रूप से स्वीकार किया—विशेषकर मलेशिया-श्रीलंका जलमार्ग के संभावित विकास को लेकर—परन्तु उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि “अस्थिर अंतरराष्ट्रीय नौवहन वातावरण में एक ही विकल्प पर निर्भरता जोखिमभरा है”।

सार्वजनिक प्रतिक्रिया मिश्रित है। कुछ व्यापारी वर्ग ने कहा कि अमेरिका की इंटरवेंशन से तेल व प्रायः माल की सप्लाई में व्यवधान का डर कम हो सकता है, जबकि कई डाक्टर नेतृत्व वाले मतदाता “सुरक्षा की प्राथमिकता” के नाम पर राष्ट्रीय स्वतंत्रता की माँग कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर “Project Freedom = Freedom to exploit our waters” जैसे टैग्स के साथ विरोधी आवाज़ें तेज़ी से बढ़ी हैं।

समग्र तौर पर, ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ की रुकावट ने न केवल अमेरिकी नीति की स्थिरता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि भारत के भीतर समुद्री सुरक्षा, बाहरी गठबंधन और चुनावी राजनीति को एक नई जटिलता दी है। जैसे-जैसे सरकार इस मुद्दे को संभाल रही है, विपक्षी पक्ष इसे “सड़क पर टिकी हुई ‘अस्थायी’ नीति” कह कर अंकित करने की कोशिश कर रहा है। इस समीकरण में अगले कदम क्या होंगे—अमेरिका के साथ पुनः संवाद, वैकल्पिक मार्गों का तेज़ विकास, या फिर संसद में नई विधेयक‑बढ़त—इसे देखना बाकी है।

Published: May 6, 2026