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Category: राजनीति

ताइवान की विश्व सहभागिता की मांग पर भारत की विदेश नीति में दो पुटी उलझन

इतिहास के एक छोटे से अफ्रीकी राष्ट्र एस्वातिनी की आधिकारिक यात्रा के दौरान ताइवान ने फिर से दुनिया के साथ जुड़ने का अधिकार निकालते हुए कहा कि वह ‘वैश्विक मंच’ पर अपनी आवाज़ रखेगा। यह वक्तव्य, जो अंतर्राष्ट्रीय राजनयिक मंच पर थोड़ा‑बहुत बंधन मुक्त दिखता है, भारत के लिए नई चुनौती लेकर आया है।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने तुरंत ताइवान के बयान को स्वीकार नहीं किया, बल्कि “भारत की एकरूप रेखा” को दोहराते हुए कहा कि भारत ‘एक ही चीन’ सिद्धांत को कायम रखेगा। वही समय है, जब नई दिल्ली को चीन‑ताइवान‑अमेरिका त्रिकोणीय तनाव के बीच अपनी रणनीतिक दिशा तय करनी चाहिए। फिर भी, विपक्षी दलों ने इस ‘धुंधले’ रुख पर तेज़ी से सवाल उठाए हैं। कांग्रेस ने कहा, “यदि ताइवान को ‘विश्व के साथ जुड़ने का अधिकार’ मिलता है, तो भारत की प्रतिबद्धता कहाँ है? क्या भारत चीन की नीति के बंधन में फँस रहा है?”

वित्तीय और तकनीकी साझेदारी के संदर्भ में, कई उद्योग प्रतिनिधियों ने संकेत दिया है कि ताइवान के साथ आर्थिक सहयोग को सीमित करने से भारतीय स्टार्ट‑अप इकोसिस्टम को नुकसान पहुंच सकता है। यह बात तब और तेज हो जाती है, जब अमेरिका भारत से अपेक्षा करता है कि वह ताइवान के साथ ‘नजदीकी वाणिज्यिक संबंध’ स्थापित करे, जबकि चीन खुद को “एक ही चीन” के बाहरी रंग में पिरोना नहीं छोड़ रहा।

राजनीतिक विश्लेषकों का तर्क है कि सरकार की इस दोधारी नीति में स्पष्टता की कमी, चुनावी वर्ष के नज़दीक आने से पहले ही सार्वजनिक भरोसा घटा रही है। “विधायकों को अब बारीकी से चुनना पड़ेगा कि वे ‘दोस्त’ के साथ और ‘प्रतिद्वंद्वी’ के बीच कैसे संतुलन बनाएँ,” एक वरिष्ठ संसद सदस्य ने टिप्पणी की।

यह उलझन केवल कूटनीतिक शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, निवेश, और उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में भी परिलक्षित होती है। यदि ताइवान ने अपने ‘वैश्विक सहभागिता’ के दावे को मजबूती दी, तो भारत को अपने ‘एक ही चीन’ के दावे पर पुनः विचार करना पड़ सकता है, चाहे वह ट्रैडिंग पोर्ट या साइबर सुरक्षा के मैदान में क्यों न हो। अभी के लिए, सरकार की सतर्कता “संतुलन बनाए रखने” की कूटनीति में बदल गई है, जिससे विपक्ष के प्रश्नों का उत्तर न देना, खुद में एक राजनीतिक जोखिम बन गया है।

सारांश में, ताइवान के एस्वातिनी दौरे से निकले बयान ने भारतीय विदेश नीति को दो पुटी उलझन में डाल दिया है—एक तरफ चीन‑भारत सीमा तनाव, और दूसरी तरफ अमेरिका‑ताइवान के बढ़ते आर्थिक बंधन। यह कूदती हुई धारा, जो चुनावी प्रतिज्ञाओं और सार्वजनिक हित के बीच फिसलती दिख रही है, जल्द ही भारत के राजनयिक प्रतिबिंब में उजागर होगी।

Published: May 5, 2026