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Category: राजनीति

ताइवान के राष्ट्रपति विलियम लाई का इसवातिनी दौरा, चीन के दबाव के बीच

ताइवान के राष्ट्रपति विलियम लाई चिंग‑ते ने 3 मई को इसवातिनी (पूर्वी अफ्रीका) की आधिकारिक यात्रा की, जबकि चीन ने इस दौरे को रोकने के लिए कूटनीतिक दबाव और आर्थिक हतोत्साहन का प्रयोग किया। इसवातिनी ही एकमात्र अफ्रीकी राष्ट्र है जो अभी भी ताइवान को संप्रभु राज्य मानता है, जिससे यह यात्रा दोनों पक्षों के लिए प्रतीकात्मक महत्व रखती है।

चीन, जो बर्लिन में आयोजित विश्व मंच पर ताइवान को ‘एक चीन’ सिद्धांत के तहत अस्वीकृत करने की लगातार कोशिश कर रहा है, ने इसवातिनी के साथ द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करने का प्रस्ताव रखा। लेकिन इसवातिनी की सरकार ने विद्यमान कूटनीतिक प्रतिबद्धताओं को नहीं तोड़ते हुए, ताइवान के प्रतिनिधियों को स्वागत किया और आर्थिक सहयोग के क्षेत्र में नई संभावनाओं पर चर्चा की।

भारत की इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक नहीं है। दिल्ली ने हाल ही में अफ्रीका में साझेदारी को सुदृढ़ करने के लिए “अफ्रीका‑इंडिया विशेष रणनीतिक साझेदारी” पर बल दिया है, और इस संदर्भ में चीन के विशिष्ट दबाव की आलोचना की है। कई विशेष दलीलों में कहा गया कि भारत को अफ्रीकी देशों का चयन स्वतंत्र रूप से करने देना चाहिए, न कि बड़े देशों के वैधता संघर्ष में फँसना चाहिए।

परन्तु यह भी स्पष्ट है कि भारत के भीतर इस मुद्दे को लेकर विभाजन है। विपक्षी दलों ने इस अवसर को सरकार की विदेश नीति की असंगतियों को उजागर करने के लिए प्रयोग किया, यह आरोप लगाते हुए कि नई दिल्ली चीन के साथ आर्थिक जुड़ाव को प्राथमिकता दे रही है, जबकि अफ्रीका में “वैकल्पिक” सहयोग को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा। दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने कहा कि भारत “राष्ट्रों के स्वायत्त निर्णय” का सम्मान करता है और अफ्रीका में बहुपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने का इरादा रखता है।

ताइवान-इसवातिनी संबंधों के संभावित आर्थिक आयाम भी चर्चा में रहे। ताइवान ने अपने हाई‑टेक, सेमी‑कंडक्टर्स और कृषि तकनीकी क्षेत्रों में निवेश की बात कही, जबकि इसवातिनी ने बुनियादी ढाँचा, स्वास्थ्य और शिक्षा में सहयोग के संकेत दिए। चीन के लिए यह विकासशील देशों को अपने आर्थिक घोंसले में जोड़ने की रणनीति को चुनौती देता है, और यह देखना बाकी है कि इन संपर्कों से ताइवान को किस हद तक अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल पाता है।

वास्तविकता यह है कि ताइवान की कूटनीतिक सीमाएँ लगातार घटती जा रही हैं; 2026 तक दुनिया में केवल 13 राष्ट्र ही उसे आधिकारिक मान्यता देते हैं। इसवातिनी के साथ इस यात्रा को ताइवान ने अपनी “राष्ट्र-प्रकाश” नीति के हिस्से के रूप में बतला कर, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी आवाज़ को बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन यही प्रयास चीन की आर्थिक शक्ति और बहुपक्षीय मंचों में प्रभाव को चुनौती देता है, जहाँ अक्सर छोटे देशों के विकल्प कम ही दिखते हैं।

संक्षेप में, ताइवान‑इसवातिनी यात्रा ने दो प्रमुख प्रश्न खड़े किए हैं: पहला, अफ्रीका में बढ़ती महाशक्ति प्रतिस्पर्धा के बीच छोटे राष्ट्रों की स्वतंत्र नीति का भविष्य, और दूसरा, भारत की विदेश नीति में चीन‑ताइवान के इस नए मोड़ को कैसे समायोजित किया जायेगा। समय ही बताएगा कि ये कूटनीतिक चालें ताइवान को कोई ठोस लाभ देती हैं या चीन के दबाव को केवल और अधिक कठोर बनाती हैं।

Published: May 3, 2026