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डॉगिंग डेमॉक्रेसी: मतदान केंद्रों में कुत्तों की मौजूदगी ने उजागर किए चुनावी प्रशासन की खामियां
नवम्बर 2026 के राष्ट्रीय चुनावों में, मतदान केंद्रों के द्वार पर अक्सर स्याह-भूरी आँखों वाले कुत्तों की तस्वीरें दिखने लगीं। सोशल मीडिया पर वायरल होते हुए ये चित्र ‘पोलिंग डॉग्स’ के रूप में टैग किए गए, परन्तु उनका राजनीतिक महत्व केवल कुत्तों तक सीमित नहीं रहा। इस हल्के‑फुल्के दृश्य ने चुनावी प्रक्रिया की गंभीरता, सुरक्षा मानकों और प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठाए।
परिणामस्वरूप, राष्ट्रीय चुनाव आयोग (ईसी) का कहना है कि मतदान स्थलों की सुविधा में सुधार हेतु पालतू जानवरों को प्रतिबंधित नहीं किया गया है, क्योंकि उन्हें संभावित व्यवधान के रूप में नहीं माना गया। यह बयान विभिन्न विपक्षी दलों द्वारा तुरंत चुनौती दी गई। दो प्रमुख विपक्षी गठबंधन ने कहा कि “कई राज्य‑स्तरीय चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की कार्यप्रणाली पर प्रश्न उठे हैं, फिर भी मतदान स्थल पर कुतों को बिना नियमन के प्रवेश देना प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण है।”
सत्ता दल इसको हल्का‑फुल्का सामाजिक पहलू बताकर खारिज कर रहा है। एक सरकारी प्रवक्ता ने कहा, “डेमोक्रेसी में नागरिकों की भागीदारी विभिन्न रूपों में आती है; यदि नागरिक अपने पालतू को साथ लाना चाहते हैं तो यह उनके अधिकारों की अभिव्यक्ति है। हमारा प्राथमिक लक्ष्य सुरक्षित और पारदर्शी मतदान सुनिश्चित करना है।” हालांकि, सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि बिना स्पष्ट दिशा-निर्देशों के पालतू जानवरों की उपस्थिति मतदान केंद्रों में अनावश्यक अशांति या ग़लत पहचान के जोखिम को बढ़ा सकती है।
यह मुद्दा चुनावी नीति की असंगतियों को भी उजागर करता है। पिछले साल के चुनाव में मतदान केंद्रों में सुरक्षा गार्डों की कमी, इलेक्ट्रॉनिक मशीनों की देर से डिलीवरी, तथा मतदान पत्रों की वितरण में अनियमितता को कई बार रिपोर्ट किया गया था। अभी कुत्तों की तस्वीरें वायरल हो रही हैं, तो क्या इस बार चुनाव आयोग फिर से “सुरक्षा को प्राथमिकता” नहीं दे पाएगा? आलोचक कहते हैं कि यह केवल एक ‘साइड शो’ का हिस्सा बन गया है जबकि वास्तविक चुनौतियाँ—जैसे वोटर लिस्ट में त्रुटियाँ, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग की विश्वसनीयता, और मौसमी मतभेदों की नज़र—अभी अनसुलझी ही हैं।
जनता की प्रतिक्रिया मिश्रित है। कुछ नागरिक इन तस्वीरों को ‘मतदान दिवस की सभ्यता’ के प्रतीक के रूप में देख कर मुस्कुराते हैं, जबकि अन्य इसको लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति उदासीनता के संकेत के रूप में खारिज करते हैं। सोशल मीडिया पर एक लोकप्रिय प्रवृत्ति में लोग अपने पालतू को मतदान बॉक्स के साथ फोटोग्राफ़ करके “वोटिंग डॉग” हैशटैग के साथ शेयर कर रहे हैं, जबकि कई नागरिक ने इसे “विधायी अनुशासन की कमी” के संकेत के रूप में टकरावपूर्ण टिप्पणी दी।
सुझाव के तौर पर, चयन निरीक्षकों ने कहा है कि मतदान केंद्रों की सीमा में पालतू प्रवेश पर स्पष्ट नियम बनाकर, सुरक्षा कैमरों की संख्या बढ़ाकर, तथा मतदान कर्मचारियों को प्रशिक्षण देकर इस तरह की अनपेक्षित घटनाओं से बचा जा सकता है। साथ ही, चुनाव आयोग को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की गंभीरता को प्रतिबिंबित करने वाले मानक स्थापित करने की आवश्यकता है, न कि केवल ‘विचित्रता’ को सहन करने की।
इन सभी बहसों के बीच, यह स्पष्ट है कि कुत्तों की उपस्थिति ने न केवल सोशल मीडिया को भर दिया है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के संवेदनशील बिंदुओं को भी उजागर किया है। यह सवाल कि क्या चुनाव प्रशासन ‘अशिक्षित कुत्ते’ की तरह बिखरा‑बिखरा है, या फिर यह सिर्फ एक सतही विचित्रता है, अभी भी इस चुनावी सत्र में सबसे ज़्यादा चर्चा वाला विषय बना रहेगा।
Published: May 7, 2026