जर्मनी की सैन्य शक्ति का पुनर्स्थापन: यूरोपीय सुरक्षा में भारत के लिए नई जटिलताएँ
रूस के आक्रमण के निरंतर विस्तार और अमेरिकी नीति में अस्थिरता के बिच, यूरोपीय रक्षा मंच पर जर्मनी का तेज़ी से बढ़ता वजन अब केवल एक अध्ययन‑विषय नहीं रहा। अगले वित्तीय वर्ष में जर्मन रक्षा खर्च फ्रांस और ब्रिटेन के मिलान के बराबर होने की संभावना है, और 2030 तक वह महाद्वीप की सबसे बड़ी conventional सेना का दावा करेगा। यह आंकड़े केवल जर्मन सरकार की “सबसे मज़बूत पारंपरिक सेना” की नीति लक्ष्य को नहीं, बल्कि यूरोपीय सुरक्षा तंत्र में बदलाव की गहरी गड़बड़ी को भी उजागर करते हैं।
जर्मनी का यह कदम, जो पहले से ही द्वितीय विश्व युद्ध के 81वें वार्षिकोत्सव की स्मृति में उजागर हो रहा है, कई सवाल खड़े कर रहा है। यदि यूरोपीय रक्षा परिदृश्य में जर्मन पेशी बढ़ती है, तो भारत के लिए दो प्रमुख चुनौतियाँ स्पष्ट हो रही हैं: यूरोप के साथ अपने रणनीतिक संतुलन को कैसे बनाए रखें, और इस नई शक्ति को अपनी सुरक्षा नीति में कैसे समायोजित करें।
पहला, भारत‑यूरोप संबंधों में मौजूदा द्विपक्षीय कूटनीति ने अक्सर अमेरिकी‑इंडो‑पैसिफिक साझेदारी के सन्दर्भ में यूरोपीय देशों को एक पृष्ठभूमि भूमिका मान दिया है। लेकिन जर्मनी की तेज़ी से बढ़ती रक्षा क्षमता, किसी भी समय «सुरक्षा सहयोग का नया केंद्र» बन सकती है, जिससे भारत को यूरोपीय देशों के साथ सहयोग के स्वरूप को पुनः परखना पड़ेगा। क्या भारत अब अपनी रणनीतिक खरीदारी में जर्मनी के उच्च‑तकनीकी हथियार प्रणालियों को प्राथमिकता देगा, जबकि वह पहले से ही अमेरिकी और रूसी विकल्पों के बीच फँसा हुआ है?
दूसरा, यूरोप के भीतर “संयोजित रक्षा” का दावे, घरेलू राजनीति के झंझटों से जूझ रहा है। जर्मनी के भीतर रक्षा खर्च को बढ़ाने के लिए कई गठबंधन‑आधारित बहस चल रही है—कोई तर्क देता है कि यह NATO के भरोसे को पुनर्स्थापित करेगा, तो कोई सवाल करता है कि क्या इस खर्च का मार्जिन नागरिक कल्याण में कटौती के रूप में नहीं आएगा। भारतीय मतदाता जब अपने देश में वही खर्चीले रक्षा परियोजनाएँ देखेंगे, तो क्या उन्हें “बड़े यूरोप में सुरक्षा” के नाम पर आत्म‑न्यायसंगत समझ पाएँगे?
इस संदर्भ में, भारतीय विपक्षी पार्टियों ने भी इस मुद्दे को अपने भीतर लाया है। उन्होंने जर्मनी‑केन्द्रित यूरोपीय सुरक्षा को “अस्थिरता को स्थायी बनाना” कहा, और इस बात पर सवाल उठाया कि भारत को कहीं यूरोपीय “फ़ौजी आशा” पर निर्भर नहीं होना चाहिए। जबकि केंद्र सरकार ने कहा है कि यूरोप में स्थिर सुरक्षा भारत के पश्चिमी सहयोग को सुदृढ़ करेगी, वास्तविकता में यह नीति‑विरुद्ध प्रतिपादन काफी स्पष्ट है: चाहे वह अनावश्यक रक्षा खर्च हो या आर्थिक सहयोग में पूँजी की बट्टा‑बट्टा, इन दोनों में ही भारत की जमीनी जरूरतें कगार पर आ रही हैं।
वास्तविकता यह है कि जर्मनी का इस प्रकार का बड़ोतरी, NATO के भीतर “अमेरिका‑के‑धार के बाद जर्मनी के पास वेपन‑शेयरिंग का अधिकार” की धारा बन सकती है। ऐसे में शास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि यदि यूरोपीय फ़ौज के पुनर्संयोजन में जर्मनी प्रमुख बनता है, तो इसका अर्थ यह हो सकता है कि यूरोप पर भारत की रणनीतिक निर्भरता और भी गहराई से जुड़ जाएगी। इसी स्थिति में, भारत को अपनी रक्षा नीति को राष्ट्रीय‑स्वायत्तता के दृष्टिकोण से पुनः मान्य करने की जरूरत है, न कि यूरोपीय गठबंधन की भावनात्मक सुरक्षा पर निर्भर रहने की।
जैसे-जैसे जर्मनी की सेना “सबसे बड़ी conventional फौज” बनती जाएगी, यूरोपीय सुरक्षा का मानचित्र सच्चे अर्थों में बदल रहा है। भारत के लिए सवाल वही रहता है—क्या वह इस परिवर्तन को अवसर के रूप में देखेगा, या फिर इसे एक नई सुरक्षा‑जटिलता के रूप में, जिससे उसकी रणनीतिक स्वतंत्रता पर दबाव बढ़ेगा? इस दौर में, स्पष्ट नीति‑निर्धारण और पारदर्शी सार्वजनिक बहस ही वह रास्ता हो सकता है जो भारतीय लोकतंत्र को विदेशीय शक्ति‑परिवर्तनों के बीच सतर्क रखेगा।
Published: May 4, 2026