जर्मनी के मेर्ज़ ने अमेरिकी सैनिक वापसी को इरान नीति के आलोचनाओं से अलग कहा
वाशिंगटन ने 5,000 अमेरिकी सैनिकों को जर्मनी से क्रमिक रूप से हटाने की योजना का ऐलान किया, जबकि मध्य पूर्व में तनाव फिर से बढ़ रहा है। इस पृष्ठभूमि में जर्मनी के प्रधानमंत्री फ़्रेडरिक मेर्ज़ ने संकेत दिया कि उनका इरान‑संबंधी ट्रम्प प्रशासन की नीति पर पूर्वी आलोचनात्मक रुख, सैनिक पुनर्गमन के निर्णय से कोई सम्बन्ध नहीं रखता।
मेरीस के इस बयान को प्रतिवादियों ने सहज नहीं माना। जर्मनी की मुख्य विपक्षी पार्टियों – एसपीडी और ग्रीन – ने कहा कि मेर्ज़ का यह कथन “रि‑ट्रुइपिंग” (फिर से गठबंधन करने) के प्रयास को छिपाने की कोशिश है, और यह राष्ट्र सुरक्षा को जोखिम में डाल सकता है। उन्होंने निहित सन्देश को उजागर किया कि विदेश नीति में निरंतर विरोधाभास, उस समय के अंतर्राष्ट्रीय माहौल में जर्मनी की विश्वसनीयता को घटा देता है।
वास्तव में, सैन्य घटाव की घोषणा के साथ ही जर्मनी के संसद के दो प्रमुख क़मरे में सुरक्षा कार्यकारियों की विस्तृत रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें कहा गया कि निकासी से यूरोपीय रक्षा संरचना पर आश्रितता बढ़ेगी और नाटो के सामूहिक उत्तरदायित्व को बाधित कर सकती है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी, जबकि जर्मनी अभी भी इरान के प्रति कठोर रुख अपनाए हुए है, “नीति में दोहरी मापदण्ड” की परसेप्शन बनाएगी।
इसी समय, भारत के राजनीतिक विश्लेषकों ने इस जर्मन‑अमेरिकी टकराव को एक चेतावनी के रूप में प्रस्तुत किया। भारत भी वर्तमान में अमेरिका‑चीन तनाव के बीच अपनी रणनीतिक तटस्थता को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी‑अमेरिका संबंधों में छिपी असमानताएँ, भारतीय राजनैतिक मंच पर भी देखी जा रही हैं, जहाँ विभिन्न पार्टियाँ विदेश नीति में पारदर्शिता और जवाबदेही की माँग कर रही हैं।
मेरीस के इस बयान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर “नाराज़गी को कम करने की कोशिश” के रूप में पढ़ा गया, परंतु यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि जर्मनी के अंदरूनी राजनीति के दबावों के बीच वह कितनी हद तक स्वतंत्र और सुसंगत विदेश नीति बना सकता है। असंतुलन, यदि बरकरार रहा, तो न केवल द्विपक्षीय संबंधों में बल्कि यूरोपीय सुरक्षा ढाँचे में भी बड़ी धूल उठाने की संभावना है।
Published: May 4, 2026