जेरोम पॉवेल की जांच पर फिर सवाल, यू.एस. अटॉर्नी जीनिन पिरो का पुनः आह्वान
वाशिंगटन स्थित संयुक्त राज्य की अटॉर्नी जनरल की सहायक, जीनिन पिरो ने पिछले महीने फेडरल रिज़र्व के चेयर जेरोम पॉवेल के खिलाफ शुरू की गई जांच को फिर से जीवंत करने का आग्रह किया है। पिरो ने कहा कि न्यायालय द्वारा ग्रैंड ज्यूरी की समन‑प्रक्रिया को रोकना केवल एक अस्थायी रुकावट है, न कि अंतिम विराम।
पिछले महीने एक फेडरल जज ने पिरो के ग्रैंड ज्यूरी सबपोना को अस्वीकार कर दिया था, यह तर्क देते हुए कि मौजूदा कदम फेडरल रिज़र्व की मौद्रिक नीति की स्वतंत्रता में अनावश्यक हस्तक्षेप कर सकते हैं। इस निर्णय के बाद पिरो ने आधिकारिक तौर पर जांच को बंद कर दी, लेकिन अब वह पुनः समीक्षा का अनुरोध कर रही हैं, यह संकेत देते हुए कि "संभव दुरुपयोग" के संकेत अभी भी मौजूद हैं।
यह विकास अमेरिकी राजनीति में मौद्रिक नीति के नियंत्रण को लेकर चल रहे संघर्ष को फिर से उजागर करता है। जबकि कार्यकारी शाखा ने अक्सर रिज़र्व के निर्णयों को आर्थिक स्थिरता के साधन के रूप में प्रस्तुत किया है, विपक्षी दल और कुछ विधायी सदस्यों ने लगातार इस बात पर सवाल उठाए हैं कि केंद्रिय बैंक को राजनीतिक दबाव के अधीन नहीं किया जाना चाहिए। पिरो का यह कदम, भले ही अमेरिकी संदर्भ में हो, भारत में भी समान प्रश्न उठाता है।
भारत में भी केंद्रीय बैंक की प्रायोगिक स्वतंत्रता पर बार-बार विमर्श होता रहा है, विशेषकर चुनावी मौसम में जहाँ प्रमुख विपक्षी दल RBI के चेयर को राजनैतिक हस्तक्षेप के शिकार ठहराते हैं। पिरो की पुकार इस बात की ओर इशारा करती है कि निकट भविष्य में भारतीय नीति निर्माताओं को भी अपने स्वयं के मौद्रिक प्राधिकरण की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गहन विचार करना पड़ सकता है।
अमेरिकी सरकार की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिली है, परंतु वित्त मंत्रालय ने पूर्व में कहा था कि "सभी वित्तीय संस्थानों को कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करना चाहिए और स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए"। यह बयान अक्सर राजनीतिक आलोचनाओं को संभालने के लिए प्रयुक्त होता है, जबकि वास्तविक प्रभाव का निरीक्षण अभी बाकी है।
बाजारों ने पिरो के बयान पर हल्का हलचल देखी, जिसमें डॉलर‑येन और डॉलर‑यूरो को कुछ हद तक अस्थिरता का सामना करना पड़ा। यदि जांच फिर से शुरू होती है, तो वित्तीय सेक्टर को नई अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है, जिससे न केवल अमेरिकी बल्कि वैश्विक बाजारों पर असर पड़ेगा।
इसी प्रकार, भारतीय नीति निर्माताओं को अब यह तय करना होगा कि क्या वे अमेरिकी अनुभव से सीख लेकर RBI की कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता बढ़ाएंगे, या फिर मौद्रिक नीति को राजनीतिक विमर्श से दूर रखते हुए सुदृढ़ स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे। पिरो की पुनः आह्वान इस दिशा में एक महत्वपूर्ण केस स्टडी बनकर उभर रही है, जो राष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही और संस्थागत शक्ति के संतुलन पर गहराई से सवाल उठाती है।
Published: May 3, 2026