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जॉर्डन के पत्थर की नगरी पेट्रा में पर्यटन का सन्नाटा, भारत की मध्य‑पूर्व नीति पर सवाल उठे
अमेरिका‑इज़राइल और ईरान के बीच तेज़ी से बढ़ता संघर्ष अब जॉर्डन की विश्व‑प्रसिद्ध प्राचीन स्थली पेट्रा तक का असर कर चुका है। पिछले दो माह में पाषाण‑शिल्प वाले इस धरोहर स्थल का दौरा करने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या पिछले वर्ष के समान अवधि की तुलना में 70 प्रतिशत गिर गई, जिससे स्थानीय बुकिंग एजेंसियों और गाइडों की आय लगभग आधी रह गई।
जॉर्डन ने हमेशा अपने तटस्थ रुख को एक नज़र में संजोए रखा है, लेकिन शत्रु‑सम्पन्न हवा में भी शांति‑प्रतिज्ञा जारी रख पाना अब मुश्किल हो गया। युद्ध‑परिस्थितियों के कारण हवाई मार्गों के बंद होने, वीज़ा प्रक्रिया में देरी और सुरक्षा‑संबंधी चेतावनियों ने पर्यटन‑प्रवाहित धारा को रोक दिया। इस दौरान, इस्पात‑शिल्पी रूपी पेट्रा ने अपने आप को एक ‘सिर्फ़ तस्वीरों में ही दिखने वाला इतिहास’ बना लिया है।
भारत के लिए यह विकास‑संकट विशेष रूप से दिलचस्प है क्योंकि पिछले वर्ष भारतीय यात्रा‑संकुल ने पेट्रा को प्रमुख मध्य‑पूर्व गंतव्य घोषित कर लगभग 1.2 करोड़ रुपए का अनुमानित राजस्व अर्जित करने की योजना बनाई थी। भारतीय पर्यटकों की कमी से न केवल उन यात्रा‑एजेंसियों को घाटा हो रहा है, बल्कि भारत‑जॉर्डन व्यापार के पुनःस्थापन पर भी असर पड़ रहा है – विशेष रूप से जॉर्डन के पत्थर‑शिल्प और रेत‑गुड़िया निर्यातियों के लिए।
भारत की विदेश नीति के शिल्पकारों ने इस पर त्वरित प्रतिक्रिया दी। विदेश मंत्रालय ने मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए “सुरक्षा कारणों से मध्य‑पूर्व में पर्यटन‑यात्रा को टालने” की सलाह जारी की और भारतीय नागरिकों को अपने पासपोर्ट एवं वीज़ा की अद्यतनी स्थिति जांचने का अनुरोध किया। इसके साथ ही, विदेश मंत्रालय ने जॉर्डन के साथ द्विपक्षीय संवाद जारी रखने का आश्वासन दिया, जिससे “शांतिपूर्ण समाधान की दिशा में अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में भारत की भूमिका” को उजागर किया गया।
परंतु भारत के विरोधी दल इस पर आलोचनात्मक स्वर नहीं छिपा पाए। राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने कहा, “जब विदेश मंत्रालय ने भारतीय यात्रियों को 'जोहरी' बताया, तो एजेंसियों को पहले से ही एक ही सवाल का सामना करना पड़ता है – क्या हमारी मध्य‑पूर्व नीति सिर्फ़ औपचारिक बयानों तक सीमित है?” विरोधी दल ने यह भी कहा कि सरकार को न केवल त्वरित मानवीय सहायता की व्यवस्था करनी चाहिए, बल्कि उन भारतीय उद्यमियों के लिए बीमा‑स्कीम व पुनःवित्तीय सुविधाएँ प्रदान करनी चाहिए जिन्हें इस अचानक झटके से आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।
नीति‑निर्माताओं की इस बहस में एक रोचक विरोधाभास भी नज़र आ रहा है। पिछले साल भारत सरकार ने “ऊर्जा सुरक्षा हेतु मध्य‑पूर्व के साथ रणनीतिक साझेदारी” पर जोर दिया था, जबकि अब वही क्षेत्र आतंक‑संकट के शिकार बनता दिख रहा है। इस दोहरे मानक को उजागर करते हुए कई विश्लेषकों ने सरकार से “जागरूकता‑परिपूर्ण जोखिम‑प्रबंधन” की माँग की है, जो केवल सार्वजनिक बयान तक सीमित न रहकर वास्तविक आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था में परिलक्षित हो।
जनसाधारण के लिए सवाल सरल है: क्या भारत ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आवाज़ उठाने की क्षमता रखता है, जहाँ उसके हितों को सीधे‑सामने रखे जाने वाला संघर्ष चल रहा है? जबकि विदेशी यात्रियों का सन्नाटा पेट्रा की चट्टानों में गूँज रहा है, भारत को अपने मध्य‑पूर्व नीति‑विचार को पुनःसमीक्षा करने और ऐसी अस्थिरता से प्रभावित भारतीयों के लिये व्यावहारिक उपाय तैयार करने का अवसर भी मिलता है।
Published: May 7, 2026