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चीनी सरकार ने ईरान के खिलाफ युद्ध समाप्ति की पूरी मांग – भारत की विदेश नीति पर सवाल
बीजिंग ने इस हफ्ते एक बयान में इज़राइल‑संयुक्त राज्य गठबंधन द्वारा ईरान पर चल रहे सैन्य दबाव को "पूर्ण रूप से समाप्त" करने की अपील की। इस बयान में, चीन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर शांति व संधि‑परक वार्ता की पुनःस्थापना का आह्वान किया, जबकि किसी भी पक्ष के दुर्व्यवहार को नकारा।
भारत के लिये यह विकास नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। परम्परागत रूप से नई दिल्ली ने ‘गैर‑संकुचित’ (non‑aligned) नीति अपनाई है, लेकिन हालिया वर्षों में रणनीतिक साझेदारी के तौर पर अमेरिका और इज़राइल के साथ सैन्य‑सहयोग गहरा हुआ है। साथ ही, ईरान के साथ ऊर्जा आयात, जड़ता‑रहित रॉड और चीन‑राष्ट्र द्वारा संचालित द्वीप-समूह परियोजनाओं (Belt‑and‑Road) में निवेश के चलते नई दिल्ली पर दबाव बढ़ा है।
विदेश मंत्रालय ने आज के बयान को "संघर्ष के राजनीतिक समाधान के पक्ष में" माना, जबकि प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्पष्ट रूप से कोई सशर्त जवाब नहीं दिया। विरोधी दलों, विशेषकर कांग्रेस और अंबेडकर पार्टी ने इसे सरकार की ‘द्विपक्षीय झुकाव’ का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा सुरक्षा के लिए ईरान के साथ मौजूदा आर्थिक बंधनों को नहीं तोड़ना चाहिए, और साथ ही मानवाधिकार‑औचित्य के आधार पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ ठोस रुख अपनाना चाहिए।
इस परिप्रेक्ष्य में, कई नीति विश्लेषकों ने सरकार की संकोची भाषा को ‘रिवर्स‑डिपेन्डेंसी’ की कहानी बताया। चीन‑ईरान‑इज़राइल त्रिकोणीय तनाव में भारत का दोहरा संतुलन, अगर स्पष्ट नहीं रहा तो आर्थिक सहयोग की सतह पर ‘सुरक्षा‑दृष्टिकोण’ की रेखा धुंधली हो सकती है। विशेष रूप से, ईरान से आयातित तेल की कीमतों में बदलाव, भारतीय शिपिंग कंपनियों के मध्य‑पूर्व रूट की स्पष्टता पर असर, और सॉफ्ट‑पावर पहल जैसे ‘भारत‑ईरान मित्रता संधि’ के कार्यान्वयन में देरी, सभी को सरकार की जवाबदेहियों में गिना जा सकता है।
जनता के स्तर पर, कई भारतीय प्रवासी इराक‑ईरान सीमांत क्षेत्रों में नौकरी और शिक्षा के लिए बसे हैं। चीन की शांति‑आह्वान के बाद, इस समुदाय को संभावित असुरक्षा या सुरक्षा‑उपायों में बदलाव का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, देश के व्यापारिक वर्ग को भी ईरान-निर्भर ऊर्जा तथा रॉड की निरंतर आपूर्ति के लिए स्पष्ट नीति‑निर्देशों की जरूरत है।
सारांश में, चीन की ‘युद्ध समाप्ति’ की मांग ने भारत को अपने बहुपक्षीय जुड़ाव, ऊर्जा नीति, और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच टकराव वाले मोर्चे पर पुनः विचार करने के लिये मजबूर कर दिया है। यह सवाल अब सरकार के संचार‑रणनीति, विदेश विभाग की जवाबदेही, और विपक्षी बहस में कितना ठोस उत्तर मिल पाता है, इस पर ही तय होगा कि भारत किन सिद्धान्तों के साथ अंतरराष्ट्रीय मंच पर खड़े रहेगा।
Published: May 6, 2026