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Category: राजनीति

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चुनाव मोर्चे पर बढ़ा उत्पीड़न: पार्टियों ने दर्ज किया धमकियों का प्रकोप

इस वर्ष आयोजित हो रहे स्थानीय निकाय और राज्य विधानसभा चुनावों में सामने आया एक नया चुनौती – मतदान प्रक्रिया के साथ-साथ उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं को मिली घातक धमकियां, ऑनलाइन दुवैध बयानबाजी और शारीरिक उत्पीड़न। भारत के विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदान पुरी करने वाले करोड़ों मतदाता, इस कड़ी तनावपूर्ण माहौल का हिस्सा बन रहे हैं।

रायकारियों ने बताया कि बहु‑पक्षीय मोर्चे पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। अधिकांश प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के उम्मीदवारों ने अपने सोशल मीडिया खाते बंद कर लिए हैं, क्योंकि उन्हें घातक संदेश और व्यक्तिगत पहचान को उजागर करने वाली प्रतियां मिल रही थीं। कुछ सांसदों को घर-परिवार तक पहुंचाने की धमकी दी गई, जबकि अन्य को सार्वजनिक मंच पर अपमानित करने के लिये अनुचित वीडियो साझा किए जा रहे हैं।

सत्ताधारी गठबंधन ने इन घटनाओं को “कुछ निरपराध युवा समूहों की असंगत क्रिया” कहा, तथा “आवाज सुनी जाएगी, लेकिन अपराध नहीं सह्य होगा” का आश्वासन दिया। वहीं विपक्षी मोर्चे ने सरकार पर लापरवाही का दोषारोपण किया, कहकर कि बिना सख्त कार्रवाई के यह “लोकतंत्र की पवित्रता को धूमिल कर रहा है”। उन्होंने चुनाव आयोग को कठोर सजा देने, तथा साइबर अपराध विभाग को सक्रिय करने की मांग की।

निरुपण में, राष्ट्रीय चुनाव आयोग ने घोषणा की कि सभी रिपोर्ट की गयी घटनाओं की टीम विशेष जांच करेगी, तथा किन्ही भी प्रमाणित उल्लंघनों को “कड़ी कारवाई” के तहत वर्गीकृत किया जाएगा। फिर भी, कई सामाजिक संगठनों ने इस कदम को “बहु‑पक्षीय सहयोग की कमी” के रूप में देखते हुए, वास्तविक सुरक्षा उपायों की कमी की ओर इशारा किया।

उपक्रमों में तेज़ी से बढ़ती डिजिटल पारदर्शिता, अभिव्यक्ति की सीमाओं का पुनः परिभाषण, तथा मतदान स्थल पर सुरक्षा बलों की तैनाती शामिल हैं। परन्तु आलोचक इस बात को उजागर करते हैं कि नीतिगत ढांचे में अस्पष्टता और जिम्मेदारी का अभाव चुनावी प्रक्रिया को “जटिल भय-प्रज्वलन” में बदल रहा है।

जनमत के स्वर में भी गोंज यह है कि अत्यधिक द्वेषपूर्ण माहौल न केवल उम्मीदवारों को बल्कि सामान्य नागरिकों को भी मतदान से दूर कर रहा है। कई सामाजिक विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि ऐसी निरंतर हिंसा और उत्पीड़न का सिलसिला लोकतांत्रिक भागीदारी के मूल सिद्धांत को कमजोर कर सकता है, जिससे “सुरक्षा और स्वाभिमान” के बीच असंतुलन उत्पन्न होता है।

सारांशतः, इस वर्ष के कई महत्वपूर्ण चुनावों में अभूतपूर्व स्तर की हमला-शर्तें सामने आई हैं। सत्ता, विपक्ष और प्रशासन के बीच इस मुद्दे पर टकराव जारी है, और यह देखना बाकी है कि क्या वास्तविक कार्रवाई मौजूदा नियमन की कमियों को पाट कर लोकतंत्र को पुनः सुरक्षित कर पाएगी।

Published: May 7, 2026