जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: राजनीति

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

चीन की ईरान‑संबंधी रणनीतिक जीत और भारत की सुरक्षा‑राजनीति पर सवाल

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरघची ने बीजिंग की यात्रा को एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम बताया है, जहां वे यू.एस. के साथ संभावित समझौते में चीनी समर्थन की तलाश कर रहे हैं। यह विकास न केवल ईरान‑अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों के परिदृश्य को बदलता है, बल्कि चीन को मध्य पूर्व में नई ताकत प्रदान करता है, जिससे भारत के लिए रणनीतिक चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।

बीजिंग में अरघची की मुलाकातों से स्पष्ट हो रहा है कि चीन, ईरान को आर्थिक प्रतिबंधों के परे वैकल्पिक निवेश और सैन्य सहायता की पेशकश कर रहा है। इराक, सऊदी अरब और ईरान के बीच चल रहे प्रतिद्वंद्विता को देखते हुए, इस कदम को चीन की ‘आशिया‑अफ्रीका‑यूरोप’ रणनीति के तहत एक सरप्राइज़ लाभ माना जा रहा है। भारतीय सरकार ने इस संदर्भ में अभी तक कोई ठोस बयान नहीं दिया, जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा टीमों को सूचना दी गई है कि इस बदलाव से भारत की ऊर्जा आयात और क्षेत्रीय संतुलन पर असर पड़ सकता है।

विपक्षी दलों ने इस अवसर का फायदा उठाते हुए मोइना बजसभा में केंद्र सरकार पर ‘विदेश नीति में लापरवाह’ होने का आरोप लगाया। कांग्रेस और कई राष्ट्रीय दल के नेता इस बात पर जोर दे रहे हैं कि भारत को चीन की बढ़ती प्रभावशीलता का जवाब देने के लिये ‘संतुलित, स्पष्ट और समयबद्ध’ कूटनीतिक रणनीति तैयार करनी चाहिए। वे यह भी दावा कर रहे हैं कि इस तरह की चुप्पी सरकार की ‘नीति‑विफलता’ को दर्शाती है, विशेषकर जब भारत की आयात‑निर्भरता और जलवायु‑सुरक्षा संबंधी जोखिम बढ़ रहे हैं।

इसी बीच, केंद्र सरकार ने अपने कदमों को ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ के रूप में प्रस्तुत किया है। विदेश मंत्री ने कहा कि भारत ‘सभी पक्षों के साथ संवाद को प्राथमिकता’ देगा, परन्तु इस ‘बातचीत’ में चीन की मरोड़ती रणनीति को ‘सही समय पर चुनौती’ देना आवश्यक रहेगा। यह बयान चुनावी माहौल में आया है, जहाँ अगली आम चुनावों में सुरक्षा‑अभियान और ‘विदेशी शक्ति’ के मुद्दे पर राजनीति तेज हो रही है। विपक्ष का दावा है कि सरकार की वकालत‑भरी भाषा केवल सार्वजनिक भावना को बहलाने के लिये ही है, जबकि वास्तविक नीति‑निर्धारण में देरी हो रही है।

नीति‑प्रभाव की बात करें तो चीन की ईरान में नई निवेश योजना भारत के तेल आयात को घटा सकती है, जिससे बाज़ार में कीमतों में अस्थिरता आ सकती है। इसी के साथ, अगर चीन ईरान को सुरक्षा‑सामग्री प्रदान करता है, तो उसके प्रॉक्सी समूहों की बढ़ती मौजूदगी भारत के पश्चिमी समुद्र‑मार्गों और भारतीय नौसेना के संचालन में बाधा उत्पन्न कर सकती है। इस पर प्रशासकीय जवाबदेही के तहत, रक्षा मंत्रालय ने पहले ही ‘सतत निगरानी’ और ‘सहयोगी अभ्यास’ की योजना को सक्रिय किया है, परन्तु आलोचक यह कहते हैं कि यह उपाय ‘रिपोर्ट‑पर‑बेसिस’ से अधिक सक्रिय नहीं है।

सार्वजनिक हित के नजरिये से, चीन‑ईरान गठबंधन का सबसे बड़ा ख़तरा भारतीय नागरिकों की ऊर्जा सुरक्षा है। यदि ईरान‑अमेरिका केंद्रित समझौता असफल होता है, तो अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अस्थिरता भारत की कीमत‑सहिष्णुता को प्रभावित कर सकती है। इस संदर्भ में, विपक्ष ने सरकार को ‘ऊर्जा‑संकट‑प्रबंधन योजना’ बनाते हुए संसद में बहस की माँग की है, जबकि केंद्र सरकार ने कहा कि यह योजना मौजूदा रणनीति के हिस्से के रूप में ही कार्यान्वित की जाएगी।

कुल मिलाकर, चीन की ‘सरप्राइज़’ जीत न केवल ईरान‑अमेरिका टकराव में नई जटिलता लाती है, बल्कि भारत को अपनी कूटनीति, सुरक्षा और ऊर्जा नीति के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यता भी उजागर करती है। आगामी चुनावों में यह मुद्दा राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच तेज़ी से बहस का केंद्र बने रहने की संभावना है, जबकि जनता के लिये वास्तविक प्रश्न अब भी यही है—क्या भारत के नेता इस बदलते भू‑राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देंगे?

Published: May 7, 2026