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Category: राजनीति

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चीन‑ईरान विदेश मंत्रियों की मुलाक़ात: क्या यह ईरान युद्ध को रोक पाएगा?

बीते सप्ताह चीन के विदेश मंत्री वांग यी और ईरान के विदेश मंत्री सियामर ज़ोरेई ने एक तंग‑से‑टूटे हुए घटते संघर्ष के बीच आपस में मुलाक़ात की। दोनों देशों ने बाथ कोरिडोर के माध्यम से मध्य‑पूर्व में ‘शांति की राह’ पर चर्चा की, जबकि खाई‑की-नहर के किनारे स्थित कई भारतीय ऊर्जा परियोजनाओं का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है।

भारत की बाहरी नीति का प्रमुख बिंदु, विशेषकर नरेंद्र मोदी सरकार की ‘नेक्ट एशिया’ पहल, अब इस नई चीन‑ईरान गतिशीलता के सामने दांव पर लगी है। सरकारी अधिकारियों ने बताया कि नई चीन‑ईरान कूटनीतिक पहल का उद्देश्य ‘स्थिरता’ है, परंतु विरोधी दलों का तर्क है कि यह भारत के निर्यात‑ऊर्जा और समुद्री सुरक्षा हितों को बेमिसाल खतरे में डाल सकता है।

विपक्षी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस मुलाक़ात को “हिंदुस्तान की रणनीतिक स्वतंत्रता पर एक ‘छुपा हुआ सटाप्रहार’” कहा, जबकि भाजपा चुनावी मंच पर ‘भारी रॉयल्टी’ के दावे के साथ इस पर कोई ठोस औचित्य नहीं दे पाई। कई सांसदों ने उल्लेख किया कि चीन की मध्य‑पूर्व में बढ़ती भूमिका ने भारत को दोहरे दबाव में डाल दिया है: एक ओर, ईरान के साथ व्यापार‑संबंध बनाए रखने की आवश्यकता, और दूसरी ओर, अपने सैन्य गठबंधन को अमेरिकी‑नेतृत्व वाले ‘इंडो‑पेसिफिक’ ढांचे में कायम रखने की बाध्यता।

दूसरी ओर, भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह “रोकथाम की दिशा में भारत के हितों को प्राथमिकता देता है” और दोनों पक्षों के बीच वार्ता जारी रहने के बावजूद, भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री मार्गों की सुरक्षा को पहले रखेगा। इस बयान में निहित सूक्ष्म विरोधाभास—जैसे “संतुलन” शब्द का बार‑बार प्रयोग—सार्वजनिक बहस में सवाल उठाता है कि सरकार कब ‘संतुलन’ शब्द का प्रयोग कर अपनी विफलताओं को छुपाती है।

उपभोक्ता समूहों और रणनीतिक विश्लेषकों ने भी चेतावनी दी है कि यदि चीन ईरान के सैन्य‑संगठन को ‘सांझा मंच’ बनाकर शांति को मोहरा समझ लेता है, तो भारत के लिए आधी‑मध्य‑पूर्व में ‘न्यू‑सेंटर’ बनने का वचन साधना कठिन हो जाएगा। इस पर भी विपक्षी नेताओं ने कहा कि “कोई भी बाहरी शक्ति जब तक अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देती रहेगी, तब तक भारत के ‘स्वतंत्र’ निर्णय की कोई कीमत नहीं होगी।”

अंत में कहा जा सकता है कि चीन‑ईरान की इस नई कूटनीतिक पहल ने न केवल मध्य‑पूर्व के मौजूदा तनाव को नई दिशा दी है, बल्कि भारत की विदेश नीति को भी दो‑धारी तलवार की तरह खींच रहा है। क्या नई शर्तों के तहत शांति का ‘उपर्युक्त’ स्वरूप भारत की रणनीतिक मंशा को ठेस पहुँचाएगा, यह देखना बाकी है।

Published: May 8, 2026