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Category: राजनीति

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चीन‑इरान कूटनीति: हार्मुज खोलने की पुकार, भारत के रणनीतिक दुविधा को उजागर करती

बीजिंग में इरान के विदेश मंत्री अर्घची ने चीन के विदेश मंत्री वेई झी को मिलने के बाद एक स्पष्ट बयान दिया – इरान‑युद्ध का अंत और स्ट्रेट ऑफ हार्मुज को फिर से खुला जाना चाहिए। यह मुलाक़ात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के एक हफ़्ते बाद बीजिंग यात्रा से ठीक पहले हुई, जिससे संकेत मिलता है कि चीन अपने मध्य‑पूर्व रणनीतिक हितों को दबाव में रखे बिना, अमेरिकी‑चीन रिश्ते के बोझिल मोड़ को भी अपनी पसंद के अनुसार मोड़ना चाहता है।

भारत की दृष्टि से इस कूटनीति का महत्व दो पहलुओं में घनिष्ठ रूप से जुड़ा है। प्रथम, भारत अभी भी अपनी आयातित तेल की लगभग 80 % मात्रा के लिए गल्फ़ को निर्भर करता है, जहाँ हार्मुज का बंद होना तेल की कीमतों को हिलाता है और भारत की व्यापारिक लागत को बढ़ाता है। द्वितीय, भारत की ‘संतुलन’ नीति, जो एक ओर अमेरिका के साथ गहरी रणनीतिक साझेदारी पर जोर देती है, और दूसरी ओर चीन के आर्थिक‑रणनीतिक आकर्षण को नजरअंदाज नहीं करती, अब परखा जा रहा है।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने आधिकारिक तौर पर कहा कि भारत क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सभी पक्षों को संयम बरतने का आवाहन करता है, परन्तु इस प्रकार के बयान अक्सर राष्ट्र के भीतर विरोधी पार्टियों द्वारा “अमेरिका‑चीन के बीच फँसे” होने का मज़ाक बन जाता है। विपक्षी दल, विशेषकर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन, इस बात की ओर इशारा करता है कि भारत ने गल्फ़ के वैकल्पिक रास्ते, जैसे इराक‑इरान सीमा के पार ‘जैकविला‑हैदराबाद’ तेल पाइपलाइन, को त्वरित रूप से लागू नहीं किया, जबकि चीन‑इरान का मिलन इस प्रोजेक्ट को जान बूझ कर धीमा करता दिखता है।

नीति के नजरिए से भारत का एक और अंतर इस संवाद में छिपा है: अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की बीजिंग यात्रा के दौरान चीन‑इरान के बीच “शांतिपूर्ण समाधान” की मांग, भारत को दोहरी दलील में फँसा रही है। चीन की इस पहल को भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए “विचार‑प्रासंगिक” कहा जा सकता है, परन्तु यह भी सच है कि शांघाई में इराक‑तीर के पास नई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के वादे भारत के मौजूदा निर्यात‑आयात बाधा को और जटिल बनाते हैं।

गैर‑सरकारी संगठन इस बात पर ज़ोर देते हैं कि हार्मुज को “खोलने” की मांग केवल राजनयिक आकर्षण नहीं, बल्कि एक आर्थिक दबाव है जो तेल बाजार में अस्थिरता को कम करने और चीन‑इरान को एक साथ व्यापारिक लाभ के साथ जोड़ने का साधन है। इस पर भारत की प्रतिक्रिया में भारी शब्दावली के साथ साथ वास्तविक काम की कमी प्रतीत होती है – जैसे आयात‑वित्तीय स्रोतों को विविधता देने वाली ‘इंडियन मरीन इन्फ्रास्ट्रक्चर’ योजना को अभी भी कार्यान्वयन की देर है।

समग्र रूप से देखा जाए तो चीन की इरान‑युद्ध समाप्ति की अपील, हार्मुज पुनः खोलने की माँग, तथा ट्रम्प के बीजिंग दौरे से पूर्व इस कूटनीतिक मिलन ने भारत को दो चुनौतियों के बीच खड़ा कर दिया है: एक ओर वैश्विक शक्ति संघर्ष की कगार पर सुरक्षा‑नीति को सुदृढ़ करना, और दूसरी ओर घरेलू राजनीतिक बहस में “रणनीतिक स्वायत्तता” के दावे को वास्तविक कार्रवाई से मिलान करना। समय यह तय करेगा कि भारत इन दोहरी दबावों के बीच अपनी नीतियों को किस दिशा में मोड़ता है, या फिर मौजूदा “विकल्पों के बीच का खेल” उसे कूटनीति के बौले में फँसा ही रखेगा।

Published: May 6, 2026