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गृह मंत्रालय पर प्रवास नीति में ढील के आरोप, अधिकारी इनकार करते हुए कठोर समूहों से बढ़ते दबाव का सामना
भारत के गृह मंत्रालय को हाल ही में प्रवास नीति में ‘ढील’ के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। दक्षिण‑पश्चिमी राज्यों में अवैध प्रवासियों की वापसी की संख्या में गिरावट और नई गृह सचिव के तहत नीतियों को कम प्रकाशित करने की रणनीति को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कई कड़वे आवाज़ें उठ रही हैं।
हिंदुस्तान के कई सख्त‑विचारधारा वाले संगठनों ने कहा है कि सरकार की इन कार्रवाइयों से प्रवासियों को ‘अनुचित सुरक्षा’ मिल रही है। वे प्रमुख रूप से बांग्लादेश और नेपाल से आने वाले अवैध प्रवासियों की तुरंत डिपोर्टेशन, साथ ही श्रम बंधु एवं शरणार्थी मामलों में कड़ी कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। इनके अनुसार, पिछले दो वर्षों में गृह मंत्रालय द्वारा जारी डिपोर्टेशन आदेशों में 30% से अधिक की गिरावट देखी गई है, जो ‘रक्षा‑परक’ नीति के नाम पर छिपी हुई उदासीनता को दर्शाती है।
इन आलोचनाओं का जवाब देते हुए गृह मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, “हमारी नीति में कोई ढील नहीं है। हम वैध कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किसी भी प्रवासी को भारत में स्थापित नहीं होने देंगे। मौजूदा आंकड़े यह दिखाते हैं कि 2024‑25 वित्त वर्ष में 2,15,000 अनधिकृत प्रवासियों को डिपोर्ट किया गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 5% अधिक है।” प्रवक्ता ने यह भी उजागर किया कि नई गृह सचिव ने ‘परिचालनात्मक गोपनीयता’ को बढ़ावा दिया है, जिससे नीतियों को ‘छज्जे पर नहीं, बल्कि जमीन पर’ लागू किया जा सके, और उसे ‘जनमत’ के शोर से बचाया जा सके।
विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस और नई दिल्ली के दलील-आधारित संघों ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा, “सरकार की अस्पष्टता और कम रिपोर्टिंग से जनता को सच्ची स्थिति नहीं पता चल पाती। यदि सरकार को सच‑मुच कड़ी कार्रवाई करनी है, तो उसे पारदर्शिता के साथ परिणाम पेश करना चाहिए, न कि नीति को छुपा‑छुपाकर चलाना।” उन्होंने संसद में प्रश्न उठाते हुए, “किसी भी प्रशासनिक निर्णय का सार्वजनिक लेखा‑जोखा आवश्यक है, विशेषकर जब वह राष्ट्रीय सुरक्षा और जनसंख्या के सांस्कृतिक ताने‑बाने को प्रभावित कर रहा हो।”
नीति‑विश्लेषकों का मानना है कि इस ‘नीचे‑से‑ऊपर’ रणनीति का मूल उद्देश्य सामाजिक असंतोष को नियत्रण में रखना हो सकता है, लेकिन इससे लंबी अवधि में प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठेंगे। यदि केंद्र सरकार प्रवासियों के खिलाफ तेज़ कदम उठाने का दावा करती है, तो उसे निरंकुश डिपोर्टेशन के साथ साथ मानवीय संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के संतुलन को भी स्पष्ट करना होगा।
अधिक सार्वजनिक scrutiny के बिना नीतियों की दिशा बदलना, चाहे वह ‘सॉफ्टनिंग’ ठीक हो या न हो, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर कर सकता है। इस धुंधली स्थिति में, राष्ट्रीय हित, मानवीय दायित्व और राजनीतिक आकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना, गृह मंत्रालय की अगली बड़ी परीक्षा होगी।
Published: May 9, 2026