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Category: राजनीति

ग्रीन पार्टी नेता ज़ैक पोलांस्की ने ‘ग्लोबलाइज़ द इंटिफाडा’ नारे को पूरी तरह रोकने के विरोध में चेतावनी दी

लंदन में आगामी प्रोटेस्ट के संदर्भ में, ग्रीन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ज़ैक पोलांस्की ने कहा कि वे प्रॉ-फ़िलिस्तीन मार्च में उपयोग होने वाले "ग्लोबलाइज़ द इंटिफाडा" नारे को निरुत्साहित करेंगे, लेकिन इस शब्द पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ कदम है। उन्होंने आगे कहा कि यदि सरकार या स्थानीय प्राधिकरण इस नारे को विशेष रूप से अवैध घोषित कर देते हैं तो यह लोकतांत्रिक बहस के मूल सिद्धांतों को क्षति पहुंचाएगा।

दूसरी ओर, ब्रिटिश लेबर पार्टी के प्रधान केयर स्टारमर ने पिछले हफ्ते गोल्डर्स ग्रीन में हुए यहूदी के विरुद्ध हमले के बाद इस नारे वाले मार्चों पर "कठोर कदम" मांग किए। स्टारमर का दावा है कि इस तरह के नारे उभड़ते तनाव को लंबी अवधि में "धमकीपूर्ण" बना सकते हैं और सार्वजनिक सुरक्षा को जोखिम में डाल सकते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि पुलिस को इस नारे के प्रयोग को रोकने के लिए सख्त कार्रवाई करनी चाहिए।

भारत में भी हाल के महीनों में विभिन्न सामाजिक व धार्मिक मुद्दों पर नारेबाजी और विरोध प्रदर्शनों के बारे में विस्तृत चर्चा चल रही है। कई राज्य सरकारें अब अनुशासन आयोग के तहत "हेट स्पीच" पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर रही हैं, जबकि विपक्षी दलों ने अपने मतदान आधार को सुरक्षित रखने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्वपूर्ण कहा है। पोलांस्की के बयान को इस सन्दर्भ में पढ़ा जा सकता है कि सार्वजनिक क्षेत्रों में शब्दों की सीमा तय करने के लिए किस हद तक न्यायपालिका और विधायी निकायों को हस्तक्षेप करना चाहिए।

पोलांस्की ने स्पष्ट किया कि वह किसी भी हिंसा के विरोधी हैं, परन्तु जब तक नारा स्पष्ट रूप से हिंसा को उकसाने वाला नहीं है, तब तक उसे प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए हानिकारक है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रसार को सीमित करने की बजाय शिक्षा और संवाद को बढ़ावा देना अधिक प्रभावी होगा।

इन दो विरोधी दृष्टिकोणों के बीच निहित है प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न: क्या सुरक्षा एजेंसियों को असामान्य रूप से नारे वाले प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार है, या यह सरकार की नीतियों में मौजूद खाली जगह को भरने का प्रयास है? भारतीय संदर्भ में यह सवाल और भी जटिल हो जाता है, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामुदायिक सद्भावना के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए मौजूदा वैधानिक ढांचे को पुनर्विचार करना आवश्यक है।

कुल मिलाकर, "ग्लोबलाइज़ द इंटिफाडा" पर बहस न केवल एक लंदन के प्रोटेस्ट का मुद्दा बन चुकी है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की सीमा और सुरक्षा के बीच के तनाव को उजागर करती है। भारतीय नीति निर्माताओं के लिए यह एक चेतावनी है कि शब्दों की शक्ति को समझना, उन्हें अनुचित रूप से प्रतिबंधित न करना, और साथ ही सामाजिक ताने-बाने को बहाल करने के लिए समुचित उपाय खोजना आवश्यक है।

Published: May 3, 2026