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Category: राजनीति

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ग्रीन पार्टी के नेता ज़ैक पोलेन्स्की को दायाँ मीडिया ‘बहु‑मतवादी’ कहकर हटाने की कोशिश – भारतीय राजनीति में बाएँ पक्ष की वैधता पर नई लहर

उत्तरी आयरलैंड में स्थित ब्रिटेन की ग्रीन पार्टी के नेता ज़ैक पोलेन्स्की को इस हफ्ते दायें-झुके समाचार चैनल स्काई न्यूज़ के प्रस्तुतकर्ता ट्रेवर फिलिप्स ने साक्षात्कार के दौरान ऐसा व्यवहार किया, जो उनका बायाँ विचारधारा के कारण तत्काल अस्वीकृति को दर्शाता है। पोलेन्स्की ने हाल ही में यहूदी समुदाय पर बढ़ते हमलों के बारे में चेतावनी दी थी, फिर भी दायें मीडिया ने उनके इस बयान को अनदेखा कर दिया और प्रश्न उठाए – क्या वाम‑पक्षी नेता की आवाज़ को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर भी वैध माना जाएगा?

दो हफ्ते पहले इज़राइल के दैनिक हाएरेत्ज़ में पोलेन्स्की ने कहा था: “मैं बढ़ते एंटी‑सेमिटिक हमलों को लेकर चिंतित हूं; हमें यह पहचानना होगा कि यह सुरक्षा की वास्तविक भावना है या केवल एक भय है।” उनका यह बयान बुनियादी रूप से यहूदी समुदाय के प्रति सुरक्षा की माँग था, परन्तु यूके के प्रमुख दाहिने-झुके प्रेस ने इस पर प्रश्नचिह्न लगा दिया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि बायीं विचारधारा को ‘बहु‑मतवादी’ कहा जाता है और बहस से बाहर रखा जाता है।

भारत में इस तरह का प्रतिरूप दोहराया जा रहा है। बाइडेन की तरह शिथिलता में लिपटे बायीं पार्टियों को अक्सर ‘विरोधी राष्ट्रवादी’ कहा जाता है, जबकि मध्यम वर्ग और अल्पसंख्यक वर्गों की वास्तविक शिकायतें दबा दी जाती हैं। सिंह के बाद से कई राज्य विधानसभा में विपक्षी दलों की आर्थिक नीतियों और पर्यावरणीय चिंताओं को ‘आधुनिक भारत के विकास के विरुद्ध’ कहा जाता है, जिससे न केवल विपक्षी दल बल्कि सामाजिक संगठनों की आवाज़ भी अंधाधुंध दबाव में आती है।

देश के प्रमुख समाचार चैनलों में वाम‑पक्षी नेताओं के बयान अक्सर ‘विचारधारा के कारण असंगत’ के रूप में प्रस्तुत किए जाते हैं। जैसे फिरोज़पुर में तेज़ी से बढ़ती जलसंकट की रिपोर्ट के दौरान, जलवायु विधानसभा के एक बायँ नेता ने बढ़ते जल‑संकट को ‘सरकार की लापरवाही’ कहा, तो उसे ‘राज्य के विकास में बाधा डालने वाली’ बताया गया। यह वही त्रांस‑पारदर्शी भेदभाव है, जो पोलेन्स्की के मामले में देखा गया।

इनकी तुलना ब्रिटेन में ‘राइट‑विंग पब्लिकेशन’ की रणनीति से की जा सकती है, जहाँ बायीं विचारधारा को ‘विदेशी एजेंट’ कहा जाता है और असली मुद्दों को ‘भ्रम’ में बदल दिया जाता है। इससे जनसंचार में भ्रम उत्पन्न होता है, और नीति‑निर्धारक इन मुद्दों को परखने की जिम्मेदारी से बचते हैं।

वायदेबाजी की जगह जवाबदेही की जरूरत है। चाहे वह यूके का स्काई न्यूज़ हो या भारत का मुख्य समाचार चैनल, सभी को यह साबित करना चाहिए कि वे केवल विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि तथ्यपरक सत्य के आधार पर ही रिपोर्टिंग कर रहे हैं। इस दिशा में संसद में बहस दिलाने की जरूरत है – जैसे कि भारतीय संसद में विपक्ष ने हाल ही में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ते हमलों पर प्रश्न उठाए थे, परन्तु सरकार ने अक्सर “ये छोटे‑छोटे मुद्दे हैं” कह कर उन्हें टाल दिया।

अंत में, ज़ैक पोलेन्स्की के मामले से यह स्पष्ट होता है कि किसी भी लोकतंत्र में बायीं आवाज़ को ही बक्से से बाहर नहीं किया जा सकता। अगर भारत में भी वैध बहस, नीति की पारदर्शिता और सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो लोकतंत्र की बुनियाद ही कमजोर हो जाएगी। यह राजनीति का वह क्षण है जब बायां और दायां दोनों को एक ही मंच पर लाकर असत्य को स्पष्ट करना आवश्यक है, न कि ‘विचारधारा’ के नाम पर किसी को भी आवाज़ से कट देना।

Published: May 6, 2026