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Category: राजनीति

ग्रीन पार्टी को कोर्बिनवाद के निपटान से सीख लेनी चाहिए: भारतीय बाएँ राजनीति की परीक्षा

पिछले दशक में ब्रिटेन की राजनीति ने एक गुप्त लेकिन गहरी जंग देखी – बाएँ‑पक्षीय आंदोलन और स्थापित प्रतिपक्षी धारा के बीच की टकराव। यह संघर्ष केवल संसद की चुनिंदा सीटों तक सीमित नहीं रहा; यह मीडिया, बड़े व्यवसाय, उच्च प्रशासन, सामाजिक आंदोलन और अपेक्षाकृत अनदेखी जनसंख्या तक फैला रहा। अब जबकि इस जंग के कई परिणाम स्पष्ट हो रहे हैं, भारतीय बाएँ राजनीतिक दल—विशेषकर हाल ही में उभरे ग्रीन गठबंधन—को इस अनुभव से गंभीर सीख लेनी होगी, नहीं तो वे उसी पतन का सामना कर सकते हैं जो जेरेमी कोर्बिन के नेतृत्व में लैबर पार्टी और ज़ैक पोलांस्की के ग्रीन आंदोलन को हुआ।

कोर्बिनवाद के पतन की सबसे बड़ी वजह कई पक्षों की आपस में असंगत अपेक्षाएँ थीं। 2015‑2019 के दौरान कोर्बिन ने लैबरेटर को सामाजिक न्याय, सार्वजनिक सेवाओं का पुनरुद्धार और आक्रमण‑विरोधी विदेश नीति पर केंद्रित करने का प्रयास किया। युवा, कामकाजी वर्ग और पर्यावरण‑सचेत मतदाता इन वादों से आकर्षित हुए, परन्तु पार्टी के भीतर के पारंपरिक प्रबंधक‑आधारित संरचना ने इन विचारों को व्यावहारिक नीति में तब्दील करने में असफलता दर्शायी। परिणामस्वरूप, 2019 के आम चुनाव में कोर्बिन को ‘अधिकतम असफलता’ का टैग मिला, और बाएँ‑पक्षीय बहुमत ने स्वयं को सबसे ज्यादा पराजित महसूस किया।

इसी तरह ज़ैक पोलांस्की ने ब्रिटिश ग्रीन को नई ऊर्जा देने की कोशिश की—भूरा‑राजनीति, जलवायु आपत्कालिकता और युद्ध‑विरोधी बयानों को मिलाकर एक पॉपुलिस्ट मंच तैयार किया। हालांकि, पोलांस्की के बयान तेज़ और उग्र थे, परन्तु उनकी रणनीति में ‘नीची पाई’ की कमी थी: बिना ठोस नीति‑ड्राफ्ट और संगठनात्मक स्थायित्व के, उनके समर्थनकर्ता सिर्फ मौसमी उत्साह में फँसे रहे। यदि वह इस ‘निम्बल’ (nimble) रूप-रेखा को नहीं अपनाते, तो उनका भविष्य भी कोर्बिन की तरह ही ‘धूल में मिल गया’।

भारतीय संदर्भ में यह कहानी दो प्रमुख प्रश्न उठाती है। पहला, क्या भारतीय ग्रीन गठबंधन (जिन्हें अक्सर पर्यावरण‑केंद्रीकृत परिधान में देखा जाता है) वाकई में सटीक नीतियों, ठोस गठबंधन‑रचनाओं और दीर्घकालिक रणनीतियों के बिना चुनावी उत्साह का मंच नहीं बना रहा? दूसरा, क्या मौजूदा बाएँ‑पक्षीय दल—जैसे कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई (एम)), ट्रैडिशनल लेफ्ट और विभिन्न जलवायु‑सुरक्षा संगठनों—गहरी असंतुष्ट युवा वर्ग को लुभाने के लिए केवल नारों और विरोधी‑सरकारी रैलियों पर निर्भर हैं?

इन प्रश्नों के उत्तर साक्ष्य‑आधारित राजनीति से ही मिल सकते हैं। पिछले दो वर्षों में, भारतीय शहरी मध्यम वर्ग ने जलवायु‑जोखिम, बेरोज़गारी की भयावहता और विदेशी सैन्य हस्तक्षेप की निंदा में स्पष्ट रुझान दिखाया है। लेकिन इन वर्गों को आकर्षित करने वाले बाएँ‑पक्षीय दल अक्सर ‘धन‑संकट’, ‘वोट‑संभवना कमी’ और ‘गुंतव्‍ता‑संकुल’ की वजह से ठोस नीति‑पत्र तैयार नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप, वे राष्ट्रीय स्तर पर ‘बड़े दावे, छोटी जीत’ की श्रेणी में फँसे रहते हैं।

कोर्बिन एवं पोलांस्की के अनुभव से स्पष्ट दो सीख भारतीय ग्रीन और बाएँ‑पक्षीय गठबंधन के लिए प्रासंगिक हैं:

इन बिंदुओं को नजरअंदाज़ करने का जोखिम वही है जो कोर्बिन को ‘सामान्य चुनावी हार’ की ओर ले गया था। भारतीय जनता ने पहले ही दिखा दिया है कि वह ‘पर्यावरण‑संकट’ को सतही विरोधी-सरकार के नारे से नहीं, बल्कि सच्ची आर्थिक‑सामाजिक सुधारों से ही मानता है। यदि ग्रीन गठबंधन और बाएँ‑पक्षीय दल इस परिवर्तन को समझकर अपने एजेण्डा को बेहतर ढंग से प्रस्तुत नहीं करते, तो वे ‘विरोधी‑आवाज’ की भीड़ में बिखर कर निरर्थक रहेंगे।

अंततः, भारतीय बाएँ‑पक्षीय राजनीति को यह सीखना चाहिए कि ‘कोर्बिनवाद का पतन और पोलांस्की की अस्थिरता’ केवल एक विदेशी केस स्टडी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। संदेश स्पष्ट है: विचार‑धारा जितनी ही जरूरत है, उतनी ही ‘कार्यान्वयन‑क्षमता’ और ‘संगठनात्मक स्थिरता’। इन तीनों स्तम्भों पर टिके रहने वाले ही भविष्य के चुनावों में लोकतांत्रिक वैधता और नीति‑प्रभाव बनाकर जनता के भरोसे को जीतेगा।

Published: May 5, 2026