गाज़ा में बढ़ते त्वचा रोगों को लेकर भारत की विदेश नीति पर सवाल
समीपवर्ती गाज़ा में श्रम शिविरों में तीव्र गर्मी के कारण त्वचा रोगों का प्रकोप तेज़ हो रहा है। चिकित्सा कर्मियों की रिपोर्ट के अनुसार, तापमान के 30 डिग्री से ऊपर उठने पर एगेज़ी (एग्जिमा), इम्पेटिगो और फंगल संक्रमण जैसे रोगों की दर में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। अस्थायी स्वास्थ्य संस्थानों में दवाइयों और बुनियादी देखभाल की कमी के साथ, रोगी अक्सर गंभीर जटिलताओं का सामना कर रहे हैं।
इसी बीच, भारत सरकार ने इस मानवीय संकट को ‘वैश्विक जिम्मेदारी’ के तहत कई भौतिक सहायता पैकेज भेजने का दावा किया है। विदेश मंत्रालय के एक बयान में कहा गया कि भारत ने मौजूदा प्रतिबंधों के बीच वैद्यिक आपूर्ति, पुनर्जीवित करने योग्य शीतकरण उपकरण और जल शुद्धिकरण सामग्री की एयरड्रॉप की व्यवस्था की है। परन्तु विपक्षी दलों ने इन दावों को सतही और अप्रभावी ठहराते हुए कई प्रश्न उठाए हैं।
राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास को लेकर चुनाव के ठोस माहौल में, यह मुद्दा दोनो प्रमुख दलों के बीच तीखी बहस का कारण बना है। सरकार के इस वर्ष के विकास एजेंडे में ‘राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय नैतिकता’ को प्रमुख रैंक पर रखा गया है, जबकि विपक्ष ने कहा कि।
विपक्षी नेता अमित शाह (भविष्यो) ने संसद में कहा—“वास्तविक मदद में दवाइयों की निरंतर आपूर्ति, रोगी उपचार के लिये उचित क्लिनिक और विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती शामिल है, लेकिन यहाँ केवल विज्ञापन‑जैसे सहायता पैकेज और वादे ही देखे जा रहे हैं।” उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि भारत की कूटनीतिक प्रवृत्तियों में इज़राइल के साथ बढ़ते सहयोग के कारण गाज़ा के शरणार्थियों को पर्याप्त समर्थन नहीं मिल पा रहा।
इसी प्रकार, कांग्रेस के स्वास्थ्य मंत्री ने विदेश मंत्रालय से मांगा कि आइसोलेशन क्लिनिकों के लिए आवश्यक एंटीफंगल दवाओं की शीघ्रता से आपूर्ति हो, और यह भी कहा कि “डॉक्टरों की कमी को पूरी तरह से अनदेखा नहीं किया जा सकता।” उन्होंने सरकार को यह भी याद दिलाया कि देश के भीतर भी ग्रामीण इलाकों में स्किन केयर की बुनियादी सुविधाएँ अभी भी अपूर्ण हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर मानवीय मामलों में दोहरे मानकों को बरदाश्त नहीं किया जा सकता।
विपक्ष के इस आक्रमण का एक और तकनीकी पहलू यह है कि भारत के मौजूदा आयात नीति में प्रतिबंधित क्षेत्रों के लिये सशर्त अनिवार्य लाइसेंस की व्यवस्था है, जो अक्सर आयात प्रक्रिया को महीनों तक खींच देता है। इस कारण से, कई अंतरराष्ट्रीय NGO और यूएन एजेंसियों ने हवाला दिया कि त्वचा रोगों के उपचार हेतु आवश्यक एंटीफंगल क्रीम और बुनियादी स्वच्छता सामग्री का निर्यात देर से हो रहा है।
वास्तविकता यह है कि गाज़ा में स्वास्थ्य सेवाओं की हालत पहले से ही अस्थिर थी; अब गर्मी के कारण रोगों का दायरा विस्तृत हो गया है, और यह न केवल चिकित्सा कर्मियों को, बल्कि स्थानीय प्रशासन को भी थका रहा है। यदि भारत अपनी परराष्ट्र नीति को दृढ़ वचनबद्धता के साथ नहीं जोड़ता, तो इसे ‘राष्ट्र के नैतिक दायित्वों का दायित्वहीनता’ कहा जा सकता है।
आगामी राष्ट्रीय चुनावों में इस मुद्दे को राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग किया जा सकता है, जहाँ सरकारी दावों की वास्तविकता और अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत के दायित्व को लेकर सार्वजनिक विमर्श तेज़ी से उभर रहा है। इस प्रकार, गाज़ा के शरणार्थी शिविरों में त्वचा रोगों की वृद्धि केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय नीति, प्रशासनिक जवाबदेही और चुनावी राजनीति के संगम को उजागर करती है।
Published: May 5, 2026