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Category: राजनीति

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गाज़ा में इज़रायली हमला: पिता की मौत पर बेटे का शोक और भारत की द्विपक्षीय नीति पर सवाल

गाज़ा में एक सुरक्षा पोस्ट पर इज़राइल द्वारा किये गये हवाई हमले में तीन लोग मारे गये, जिनमें एक पिता भी शामिल है। आज उसका छोटा बेटा उस क्षण को याद कर रो रहा है, जहाँ उसका जीवन अचानक उजाड़‑सफ़ेद हो गया। स्थानीय मीडिया ने साहसिक रूप से इस दर्द को दर्शाते हुए बतलाया कि बच्चा अपने पिता की तस्वीर को थामे, आँखों में आँसू भरकर कह रहा है, “मेरे पापा वापस नहीं आ पाएंगे”। यह व्यक्तिगत त्रासदी गाज़ा के लगातार रहने वाले मानवीय संकट की एक नई परत जोड़ती है।

भारत के लिये इस घटना का प्रतिध्वनि केवल विदेश नीति के कागज़ी बयानों तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ महीनों में, नई दिल्ली ने इज़राइल‑फ़िलिस्तीन के मुद्दे पर दो‑तरफ़ा समझौते, सुरक्षा सहयोग और व्यापारिक समझौते को आगे बढ़ाया है। प्रधानमंत्री के कार्यालय ने “इज़राइल के आतंकवाद‑विरोधी कदम” की प्रशंसा करते हुए कहा, “भारत का इस संघर्ष में स्पष्ट रुख है”। विरोधी दल, विशेषकर कांग्रेस और विभिन्न बधिर सभा‑समूहों ने इन बयानों को “नैतिक पतन” और “मानवता के मूल सिद्धांतों की उपेक्षा” कह कर काटा।

इस बहस का एक प्रमुख मोर्चा चुनावी वार्तालाप में बदल चुका है। आगामी विधानसभा चुनावों में विपक्ष ने कई बार इस मुद्दे को उठाकर सत्ता को “अमानवीय” और “हिंसक” सरकार का लेबल दिया है, जबकि केन्द्र सरकार ने इसे “सुरक्षा‑संबंधी सहयोग” की कसौटी पर ठोस ठहराया है। दोनों पक्षों के बीच घनिष्ट झगड़े की परत में यह सवाल उभरता है: क्या किसी भी विदेशी संघर्ष में मानवाधिकार‑आधारित नीति के बिना रणनीतिक लाभ को प्राथमिकता देना भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ संगत है?

नीति‑प्रभाव की दृष्टि से, भारत ने पिछले साल गाज़ा के लिए मानवीय राहत में 10 करोड़ रूपए की आवंटन की घोषणा की थी, लेकिन वितरण प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव और अनगिनत अनुदान की गांठें बनी हुई हैं। इस प्रकार, “सुरक्षा सहयोग” के बोलचाल के साथ “मानवीय जिम्मेदारी” के चर्चे में असंगति उत्पन्न हो रही है, जो आम जनता को विशिष्ट तौर पर चिन्तित कर रहा है।

सार्वजनिक हित की बात करें तो, गाज़ा में इस बच्चे का शोक भारत में कई पूर्वाग्रह‑रहित शांति‑आंदोलनकारियों को अपने आप से जुड़ने का कारण बनता है। सामाजिक सक्रियता समूह, युवा संगठनों और छात्र संघों ने इस त्रासदी पर मंचों में सवाल उठाए हैं: “इज़राइल के सैन्य बल को किन शर्तों पर समर्थन दिया जाये, और क्या भारत को अपने मूलभूत मूल्य‑आधारित विदेश नीति को पुनः परिभाषित करना चाहिए?” ऐसी आवाजें अब केवल राजनयिक शब्दों तक सीमित नहीं, बल्कि संसद के प्रश्नकाल, लोकसभा बहस और आम जनसंचार में भी सुनाई देती हैं।

इसी प्रकार, एक छोटे बच्चे के शोक में गाज़ा के विस्मयकारी दर्द को प्रतिबिंबित करते हुए, भारत की द्विपक्षीय नीति को फिर से जांचने का समय आ गया है। यदि सरकार संरचनात्मक जवाबदेही और मानवीय दायित्व को साथ-साथ नहीं लेती, तो चुनावी प्रतिज्ञाएँ और वास्तविक नीति‑निर्माण के बीच का अंतर और अधिक स्पष्ट हो जाएगा। अंत में यह कहा जा सकता है कि गाज़ा के वह बच्चा, जो अपने पिता को जड़ता में ढूँढता है, भारतीय राजनीति के उस मोड़ को भी प्रकट कर रहा है, जहाँ सिद्धांत और रणनीति का टकराव नागरिक चेतना को सतर्क कर रहा है।

Published: May 8, 2026