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गाज़ा के पत्रकार की हत्या पर भारत में सरकार‑विपक्षी टकराव: एक नई जन्मी बच्ची के साथ दहशत की दास्तान
साना के पहले जन्मदिन पर गहरी छाया पड़ी, क्योंकि उसके पिता याहिया, एक स्वतंत्र पत्रकार, को इज़राइल के एक हवाई हमले में मार दिया गया। जन्म के तुरंत बाद हुई इस हत्या ने सिर्फ गाज़ा में ही नहीं, बल्कि भारत की राजनीति में भी धूम मचा दी। विदेश नीति के मैदान में अब सरकार‑विपक्षी प्रतिद्वंद्विता की नई लहर उभर रही है, जहाँ मानवाधिकार, चुनावी दावे और प्रशासनिक जवाबदेही का गाठा बंध रहा है।
इज़राइल‑पैलिस्तीन संघर्ष में भारत की मौन नीति, जो पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक गठजोड़ों के नाम पर औपचारिक रूप से पक्की दिखाई गई, इस घटना के बाद तीखी आलोचनाओं का शिकार बन गई। केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर “इज़राइल के साथ सुरक्षा सहयोग की निरंतरता” के पक्ष में बयान दिया, जबकि मानवीय संकट पर बहु‑पक्षीय मंचों में सीमित ही टिप्पणी की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा, “हम सभी शरणार्थियों की मदद करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानकों का पालन करेंगे”, परन्तु इस कथन को कई बार विरोधियों ने “वाक्पटु शून्य” कहा।
विपक्षी दलों ने इस दंगाई को “संकट को नजरअंदाज़ करते हुए अपने रणनीतिक हितों को प्राथमिकता देना” के रूप में निंदा किया। प्रमुख विपक्षी नेता ने संसद में प्रश्न उठाते हुए कहा, “इज़राइल को निरंकुश समर्थन देना, जबकि गाज़ा में शरणार्थी और पत्रकार शिकार हो रहे हैं, यह किसी भी लोकतंत्र के सिद्धांत के विपरीत है”। उन्होंने सरकार को व्यापक मानवाधिकार रिकार्ड रखरखाव और संयुक्त राष्ट्र के मानवधारा प्रस्तावों के तहत ठोस कदम उठाने के लिए बुलाया।
इस बात को देखते हुए, कई राज्य विधानसभा में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई। उत्तर प्रदेश के एक विधायिक ने “इज़राइल साथियों को लेकर ‘सुरक्षा’ शब्द का प्रयोग करके भारतीय जनता को धोखा दिया जा रहा है” कहा, जबकि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने “गाज़ा की दुर्दशा में भारत की मंशा स्पष्ट है: शांति प्रयासों में सहायता करना, न कि ओरपोलिसियों में भाग लेना” का उल्लेख किया। यह विविधता दर्शाती है कि राष्ट्रव्यापी राष्ट्रीय सुरक्षा की दलील पर भी, कहानी का मोड़ राजनीतिक लाभ के लिए बदला जा रहा है।
नागरिक समाज और लोगों के बीच भी इस घटना पर तीव्र प्रतिक्रिया देखी गई। दिल्ली, गांधीनगर और कोलकाता में “जस्टिस फॉर याहिया” के नारे लगाते हुए हड़तालें दर्ज हुईं। सोशल मीडिया पर #JusticeForYahya और #SanaKeLiyeShanti जैसे टैग ट्रेंड करने लगे, जहाँ न केवल गाज़ा की मौनावस्था को उजागर करने की कोशिश की गई, बल्कि भारत की विदेश नीति के नैतिक पहलू को भी सवाल के दायरे में लाया गया।
आलोचक इस बात को भी उजागर कर रहे हैं कि भारत, जो अपने संविधान में धर्मनिरपेक्षता और मानवाधिकारों को मूल स्थापित करता है, अब ऐसे अंतर्राष्ट्रीय गठजोड़ को बढ़ावा दे रहा है, जहाँ नागरिकों को “शारीरिक स्वरूप” की सुरक्षा मिल नहीं रही। यह विरोधाभास न केवल अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की छवि को धूमिल करता है, बल्कि देश के अंदर लोकतांत्रिक बहस में “जवाबदेही” शब्द को भी गहरा धुंधला बना रहा है।
वित्तीय वर्ष 2026‑27 में सरकार द्वारा घोषित रक्षा बजट में इज़राइल‑प्रेरित तकनीकों के लिये विशेष कोटा शामिल है, जबकि वही बजट मानवीय सहायता समूहों के लिये केवल नगण्य आवंटन रखता है। यह असंतुलन कई विश्लेषकों ने “नीति‑विफलता” के रूप में चिह्नित किया है, जिसमें “दूरस्थ संघर्षों में भागीदारी की कीमत” पर सवाल उठाया गया है।
सत्र का समाप्त इस बात पर हो रहा है कि चुनावी माहौल में सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग की बातों को मतदाता के ह्रदय में कैसे बुनना है। जब सत्ता के दावों में “इज़राइल के साथ दोस्ती” का दावा किया जाता है, तो विरोधी दल “मानवाधिकार‑प्रेमी भारत” की नयी मौखिक प्रतिज्ञा के साथ सामने आते हैं। साना और उसके पिता याहिया की कहानी, हालांकि जुदा जुदा बंधन में जड़ें रखती है, लेकिन भारतीय राजनीति में एक नई कार्रवाई‑प्रेरित बहस को जन्म देती है – जहाँ दया, नीति‑जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक जवाबदेही की परीक्षा तय हो रही है।
Published: May 7, 2026