जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: राजनीति

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

कंबोडिया-थाईलैंड सीमा संघर्ष के बीच भारत की नीति पर कड़ी परीक्षा

कंबोडिया के पूर्वी प्रांतों में थाईलैंड के साथ तकरार जारी रहने के कारण सैकड़ों परिवार अपने घरों से बेज़ार हो गए हैं। लड़ाइयों ने स्कूलों को बंद करवा दिया, जिससे शिक्षा क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हो रहा है। स्थानिक लोगों ने कहा कि नई आगाज में फिर से हिंसा की आशंका बनती जा रही है।

इन घटनाओं पर भारत सरकार ने तत्काल उच्च‑स्तरीय राजनयिक संपर्क स्थापित करने का निर्देश दिया। विदेश मंत्रालय ने दोनों पक्षों को शांति की ओर पुनः वार्ता करने की अपील की और इस संघर्ष को एशियाई सुरक्षा समीक्षाओं के झंझट से बचाने का आव्हान किया। यह कदम भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के तहत क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता देने की सार्वजनिक घोषणा के साथ मेल खाता है।

हालाँकि, विपक्षी दलों ने नई सरकार की इस पेशकश को सतही बताया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व में कई सांसदों ने नोट किया कि भारत ने असंगठित रूप से मानवीय सहायता भेजने में देरी की है, जबकि सीमा‑सम्पर्कित देशों को तत्परता का समर्थन मिलना चाहिए। उन्होंने सरकार से कहा कि कंबोडियाई शरणार्थियों के लिए तत्क्षण विस्थापन सहायता, शैक्षिक सहायता और स्वास्थ्य सुविधाएँ प्रदान करने की मांग की जाए, जिससे भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान न हो।

समीक्षकों ने बताया कि भारत का थाईलैंड के साथ रक्षा समझौता और कंबोडिया‑थाई सीमा पर मौजूद भारतीय सुरक्षा सहयोग के कारण इस संघर्ष में दलील‑सहयोगी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। यदि भारत सक्रिय मध्यस्थता नहीं करता, तो यह एशिया‑प्रशांत में उसकी प्रबलता को कमज़ोर कर सकता है। वहीं, यदि वह पक्ष‑लेंन हो जाता है, तो कंबोडिया के सशस्त्र बल की ओर से अनुचित समर्थन के आरोप लग सकते हैं, जिससे भारत की निःपक्षीय मध्यस्थता की छवि धूमिल हो सकती है।

विस्थापित परिवारों की स्थिति को देखते हुए, नागरिक समाज के कई संघटन ने भारतीय दूतावास से तत्काल मानवीय सहायता के लिए अनुरोध किया है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के टूटने से पीड़ित बच्चों के भविष्य पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा, और इस कारण भारत को शरणार्थियों को अस्थायी स्कूल, पुस्तकें और शैक्षिक सामग्री उपलब्ध करानी चाहिए।

इस बीच, संयुक्त राष्ट्र ने भी कंबोडिया‑थाई सगाई को स्थायी शांति हेतु अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के लिए प्रस्तावित किया है। भारत के विदेशी नीति विशेषज्ञों ने नोट किया कि यदि भारत इस पहल में सक्रिय सहभागिता नहीं लेगा, तो क्षेत्रीय संस्थाओं जैसे ASEAN के भीतर भारत की प्रतिबद्धता पर प्रश्न उठ सकते हैं।

सारांश में, कंबोडिया‑थाईलैंड सीमा संघर्ष ने न केवल मानवीय संकट को बढ़ाया है, बल्कि भारत की विदेश और रक्षा नीति को भी एक नए मूल्यांकन के मोड़ पर खड़ा कर दिया है। सरकार के बयान और विपक्ष की कड़ी पूछताछ के बीच यह देखना बाकी है कि भारत किस दिशा में कदम रखेगा—संकट के समाधान में समर्थ मध्यस्थ, या फिर रणनीतिक हितों की दिशा में कदम‑बढ़ाने वाला।

Published: May 9, 2026