केन्याई बाढ़ ने फिर उजागर किया भारत में आपदा प्रबंधन की खामियां
पूर्वी अफ्रीका के केन्या में लगातार तेज़ बारिश के कारण बाढ़ और भूस्खलन ने कम से कम 18 लोगों की जान ले ली है। कई गाँवों में बुनियादी ढांचे का ध्वस्त होना, सड़कों का कटाव और राहत कार्यों में देरी ने स्थानीय प्रशासन के तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
केन्या में इस आपदा को लेकर सरकार ने तत्काल राहत पैकेज की घोषणा की, परंतु वितरण में असमानता और सटीक डेटा की कमी ने आलोचनाकारों को सतर्क कर दिया। यह परिदृश्य भारत के कई जल आपदा‑संबंधी मुद्दों को फिर से सामने लाता है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में भी भारी बरसात के कारण बाढ़, भूस्खलन और जल‑स्रोत संबंधी आपदा की घटनाएँ बढ़ी हैं, परंतु नीति‑निर्धारण और कार्यान्वयन में अक्सर दायित्व की कमी देखी गई है।
वर्तमान में केंद्र सरकार कई बड़े जल‑प्रोजेक्ट और जल-शासन योजना पर बल दे रही है। जबकि विपक्ष इन योजनाओं को ‘स्लैपडेक’ कहकर, क्षेत्रीय स्तर पर असमान राहत के मामलों को उजागर कर रहा है। प्रतिवाद में ruling party यह तर्क देती है कि जल‑संसाधन प्रबंधन में बड़े पैमाने पर निवेश हो रहा है, परन्तु वास्तविकता में कई योजनाएँ खर्च‑अधारित बोझ बनती जा रही हैं, जबकि सुदृढ़ पूर्व‑भविष्यवाणी, समय पर चेतावनी प्रणाली और स्थानीय निकायों को सशक्त बनाने में कमी है।
केन्या की स्थिति से स्पष्ट होता है कि आपदा‑पूर्व तैयारी, डेटा‑संचालन और तेज़ राहत वितरण के बीच की खाई को पाटना कितना ज़रूरी है। भारत में उसी स्तर के प्रौद्योगिकी‑आधारित चेतावनी नेटवर्क, जलवायु‑अनुकूल बुनियादी ढांचा और पारदर्शी वित्तीय प्रवाह के अभाव ने कई बार पीड़ितों की स्थिति को और गंभीर बना दिया है।
सवाल यह नहीं कि प्राकृतिक आपदाएँ अपरिहार्य हैं, बल्कि यह है कि राज्य की जवाबदेही, नीति‑निर्माण में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जनता‑के‑हिंट पर आधारित त्वरित कार्यवाही कहाँ तक प्रभावी है। केन्याई बाढ़‑भूस्खलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि केवल बड़ी धनराशियों की घोषणा से समस्याएँ हल नहीं होंगी; उन्हें नीतिगत सच्चाई, प्रशासनिक पारदर्शिता और स्थानीय स्तर पर सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से ही सुलझाना होगा।
Published: May 3, 2026