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Category: राजनीति

कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर चलता है झगड़ा, भाजपा‑कांग्रेस दोनों है सतर्क

देश में डेटा‑प्रज्वलित तकनीक का विकास तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, और साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के संभावित जोखिमों पर राजनीतिक वर्गों में असामान्य सहमति उभरी है। जहां राष्ट्रीय स्तर पर मॉड्यूलर एआई रणनीति 2025 के बाद से विभिन्न सरकारी बैंकरों और स्टार्ट‑अप्स को प्रोत्साहन दे रही थी, वहीं विपक्षी दलों ने यह सवाल उठाना शुरू कर दिया है कि इस तेज़ी से धड़ाम मारते उद्योग को नियंत्रण में लाने के लिए मौजूदा ढांचा पर्याप्त नहीं।

वर्तमान में संसद में चले आ रहे AI नियमन बिल 2026 का मसौदा निजी‑सार्वजनिक भागीदारी, डेटा‑सुरक्षा और नैतिकता पर कई अनुच्छेद रखता है। भाजपा के नेता इस बिल को “डिजिटल इंडिया का गौरव” कह रहे हैं, जबकि कांग्रेस के प्रमुख इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि “विचार‑धारा नियंत्रण” की धारा बिना सार्वजनिक सुनवाई के अपने आप में लोकतांत्रिक ईंट-लीट को कमजोर कर रही है।

व्यक्तिगत स्तर पर, लगभग पाँच साल पहले ही देश ने एक बड़ा केस देखा—एक राजनीतिक दल की झूठी बोलती वीडियो (डिपफ़ेक) ने कई राज्यों में मतदान‑जागरूकता अभियानों को उलझा दिया। इस घटना ने सरकारी एजेंसियों को इस बात का एहसास दिलाया कि AI‑आधारित छवियों और ध्वनि‑संकलन से उत्पन्न झूठी जानकारी चुनिंदा मतदाता वर्ग को किस तरह प्रभावित कर सकती है। इसके बाद विपक्ष ने इस मुद्दे को “वोट‑बायस की मशीन” के रूप में लेबल किया, जबकि सरकार ने इसे “सुरक्षा‑तंत्र का अभिन्न हिस्सा” कहा।

राज्य सरकारों ने भी इस बूम में अपना योगदान दिया है। केरल, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश ने AI‑संचालित स्वास्थ्य‑सिस्टम और कृषि‑सहायता पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च किए, परन्तु इन प्रक्रियाओं में डेटा‑स्वामित्व और स्थानीय समुदायों की भागीदारी का सवाल अभी बाकी है। विशेषकर, ग्रामीण क्षेत्रों में AI‑आधारित निर्णय‑लेने के मॉडल को लागू करने से पहले उस पर कंट्रोल‑मैकेनिज्म की कमी ने कई विशेषज्ञों को चिंतित कर दिया है।

सिविल सोसाइटी समूहों ने इस दिशा में कई शोधनिवेदन दायर किए हैं, जिनमें “स्वतंत्र एआई” नामक मंच ने कहा है कि “तकनीकी विकास को जनसंख्या के हित में मोड़ना है, न कि चुनावी रणनीति में”。 इन समूहों की मांग है कि AI‑नियमन में एक स्वतंत्र ऑडिट बॉडी स्थापित की जाए, जिससे सरकारी और निजी दोनों संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।

ध्रुवीकरण के इस दौर में, रचनात्मक आलोचना के साथ-साथ संभावित नीति‑विफलताओं की पहचान भी महत्त्वपूर्ण हो गई है। जहाँ भाजपा का दावा है कि AI से “आर्थिक विकास का नया इंजन” मिलेगा, वहीं विपक्ष का सवाल है कि क्या यह इंजन “नौकरियों की धूमिल धुरंधर” नहीं बन जाएगा। दोनों पक्षों को अब यह साबित करना होगा कि उन्होंने केवल शब्दों के इशारे नहीं, बल्कि ठोस नियामक ढांचा और सार्वजनिक भरोसा दोनों तैयार किया है।

आगामी 2026 के लोकसभा चुनावों में इस मुद्दे को किस हद तक राजनीतिक लाभ के रूप में उपयोग किया जाएगा, यह देखना बाकी है। परन्तु यह स्पष्ट है कि AI का प्रश्न अब केवल तकनीकी नहीं, बल्कि लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय सुरक्षा की बहु‑परतियों में गूँजता है। यदि कोई दो पक्ष इस पर सहमत हैं, तो यह शायद देश को एक दिशा में ले जाने का संकेत भी हो सकता है—वह दिशा जहाँ नीति‑निर्माताओं को अपने दावों की जाँच‑परिचय करनी पड़ेगी, न कि केवल चुनावी मोर्चे पर रंगीन बैनर लहराने की।

Published: May 3, 2026