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Category: राजनीति

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कुछ राज्यों में पेट्रोल की कीमत क्यों अधिक? राजनैतिक पहलुओं की पड़ताल

भारत में पेट्रोल का मूल्य केवल कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भावों पर नहीं, बल्कि जटिल कर‑संकलन, परिवहन बंधनों और पर्यावरणीय नियमों पर भी निर्भर करता है। इस कारण, एक ही दिन दो अलग‑अलग राज्यों में ईंधन की कीमत में कई रुपये का अंतर देखना आम बात बन चुका है।

केन्द्र सरकार ने पेट्रोल पर 8% राष्ट्रीय पीएसजी (परियोजना शुल्क) और 28% जीएसटी (10% कर + 18% उपकर) लागू किया है, लेकिन शेष कर-भार प्रत्येक राज्य की अपनी रिवेट (राज्य खपत कर) पर निर्भर करता है। उत्तराखंड, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्य अपनी राजस्वकोंस लिए उच्च रिवेट लगाते हैं, जबकि गुजरात और राजस्थान जैसी राज्यें तुलनात्मक रूप से कम रिवेट लेती हैं। परिणामस्वरूप, समान कर‑संरचना के बावजूद डिश टैंक में प्रवेश करने वाले ईंधन की क़ीमत में स्पष्ट अंतर बन जाता है।

राजनीतिक स्तर पर इस तथ्य का दोहरा अर्थ निकलता है। ruling पार्टी अक्सर राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्य के तहत उत्सर्जन‑कम करने वाले एंथ्रॉपी‑टैक्स को बढ़ावा देती है, परन्तु ऐसी नीति का बोझ मुख्यतः राज्य‑स्तर के राजस्वकोंस पर डालती है। विपक्षी दल इन उपायों को ‘केंद्रस्थानीय असंतुलन’ का प्रमाण बताकर, केंद्र के संग्रहीत करों को पुनर्वितरित करने और राज्यों को कर‑डिस्काउंट देने की मांग कर रहे हैं।

इसी बीच, राजमार्गों और शिपिंग नेटवर्क की अधूरापन भी मूल्य असमानता में बड़ा योगदान देता है। हिमालयी प्रदेशों में कठिन स्थलाकृति, अपर्याप्त पाइपलाइन एवं सीमित रिफाइनरी क्षमता के कारण ईंधन को लंबी दूरी तक टैंकों द्वारा पहुंचाना पड़ता है। इस अतिरिक्त लॉजिस्टिक खर्च को अक्सर स्थानीय प्रशासन द्वारा मान्यता नहीं दी जाती, बल्कि वह इसे ‘पर्याप्त ज्वलन‑स्रोत उपलब्ध हैं’ के औचित्य में टालता है।

पर्यावरणीय नियमों की भी अलग‑अलग ढालें इस असमानता को जारी रखती हैं। कई राज्यों ने अपने उत्सर्जन मानकों को कड़ाई से लागू किया है, जिससे फाइनल उत्पादों में बायो‑डीज़ल ब्लेंड या एथेनॉल मिश्रण अनिवार्य हो गया है। जहाँ यह कदम हरित ऊर्जा की दिशा में सराहनीय है, वहीं यह अतिरिक्त प्रसंस्करण लागत को अंततः पेट्रोल की कीमत में जोड़ देता है।

विपक्षी गठबंधन इन पहलुओं को ‘राज्य‑स्तर की नीति‑विफलता’ के रूप में पेश करके, केंद्र सरकार के ‘सभी के लिए सस्ता ईंधन’ के दावों को चुनौती दे रहा है। वहीं, केंद्र ने यह तर्क दिया है कि नियामक ढांचा राष्ट्रीय स्तर पर समान नहीं हो सकता, और कई राज्य‑स्तर के निर्णयें स्थानीय आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार तैयार किए जाने चाहिए।

सार्वजनिक हित के दृष्टिकोण से सवाल यह बनता है कि कौन‑सी निकासी योग्य नीति‑भेद को खत्म किया जा सकता है। यदि कर‑मुक्ति, लॉजिस्टिक बुनियादी ढांचे का सुदृढ़ीकरण, और पर्यावरणीय मानकों के सामंजस्यपूर्ण ढंग से कार्यान्वयन नहीं हुआ, तो पेट्रोल की कीमतें ‘राज्य‑आधारित विषमता’ बनी रहेंगी, जिससे सामान्य नागरिक पर असमान आर्थिक बोझ पड़ेगा।

Published: May 6, 2026