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एमएसएफ ने कहा, इज़राइल ने गाज़ा में कुपोषण संकट को इरादा-से निर्मित किया
डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (एमएसएफ) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में इज़राइल को गाज़ा में बाल कुपोषण को जानबूझकर तेज़ करने का आरोप लगाया है। संगठन के अनुसार, जनवरी 2024 में, प्रथम बार उन्होंने इस क्षेत्र में स्पष्ट कुपोषण के केस पहचाने – वह भी युद्ध शुरू होने के मात्र तीन महीने बाद। रिपोर्ट में बताया गया है कि लगातार खाद्य सामग्री की आपूर्ति बाधित, स्वास्थ्य सुविधाओं को निरंकुश रूप से सीमित और मौजूदा मानवीय सहायता को जिद्दी ढंग से रोकने की रणनीति ने बच्चे‑व्यापी कुपोषण को गति दी है।
एमएसएफ के प्रतिनिधि ने कहा, "जब वॉर‑जोन में मौलिक पोषण‑सुरक्षा को तोड़ना ही नीति के तहत किया जाता है, तो यह केवल मानवीय संकट नहीं बल्कि एक रणनीतिक हथियार बन जाता है।" इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंच पर तीव्र प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर दीं।
भारत में इस आरोप पर प्रतिक्रियाएँ मिश्रित रही हैं। विदेश मंत्रालय ने अभी तक औपचारिक टिप्पणी नहीं दी, जबकि प्रधानमंत्री कार्यालय ने पिछले दो हफ़्तों में गाज़ा में मानवीय सहायता की त्वरित पहुँच की आवश्यकता को दोहराया। भारतीय राजनयिकों ने संयुक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को उठाने का इरादा जताया, पर साथ ही भारत की आधे‑सदिश विदेश नीति के तहत "आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं" की रीति को भी दोहराया।
विपक्षी दलों ने इस पर कड़ी लहरें चढ़ा दीं। संसद के कई सदस्यों ने सवाल उठाया कि जब भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर शांति‑निर्माण के दावेदार के रूप में खड़ा है, तो ऐसे स्पष्ट मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर स्पष्ट रुख क्यों नहीं अपनाया गया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी समूहों ने विदेश मंत्रालय से माँग की कि वह इज़राइल के इस कदम को अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन के रूप में उजागर करे और भारत‑विनिमय सहायता को इस दिशा में पुनः निर्धारित करे।
नीति‑प्रभाव के संदर्भ में, एमएसएफ की रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इज़राइल पर प्रतिबंध या नई कूटनीतिक दबाव की मांग को तीव्र किया है। संयुक्त राष्ट्र मानवीय मामलों के सचिवालय ने इज़राइल को कड़ाई से अनुसंधान करने और खाद्य व दवा की आपूर्ति को अवरुद्ध करने की सभी कोशिशों को रोकने का आह्वान किया है। भारत के दूतावास में भी इस मुद्दे को लेकर कई गैर‑सरकारी संगठनों ने मानवीय मदद की त्वरित व्यवस्था की मांग की, पर सरकारी एजेंसियों से अभी तक ठोस कार्रवाई नहीं दिखी।
सार्वजनिक स्तर पर इस खबर ने सोशल मीडिया पर विस्तृत चर्चा को जन्म दिया। कई नागरिक समूहों ने सीमा‑पार मानवीय मदद के लिये निधि इकट्ठा करने की पहल शुरू की, जबकि कुछ टिप्पणीकारों ने भारत‑इज़राइल संबंधों की सम्भावित गिरावट को लेकर चेतावनी दी।
कुल मिलाकर, एमएसएफ के आरोप ने न केवल गाज़ा के बिच्छु को उजागर किया, बल्कि भारतीय सार्वजनिक विमर्श में भी मानवीय दायित्व, अंतरराष्ट्रीय कानून और सरकारी जवाबदेही के प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जैसा कि यहाँ स्पष्ट है, मानवीय संकट का समाधान केवल बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि नीतिगत स्पष्टता, निरंतर मानवीय संघर्ष और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की सच्ची प्रतिबद्धता से ही संभव है।
Published: May 7, 2026