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Category: राजनीति

ऊर्जा लागत के बढ़ते दबाव में RBI की दर‑स्थिरता: महंगाई नियंत्रण पर संकट की जाँच

जैसे ही अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में कीमतों का उछाल भारतीय उपभोक्ताओं पर नई बर्दाश्त‑से‑बर्दाश्त कीमतें थोप रहा है, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अपने रेपो दर को 6.5% पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया। यह निर्णायक कदम, जिसने बाजार की अपेक्षाओं को उलट दिया, अब सरकार‑विरोधी के मंच पर महंगाई‑मुक्ति की नीति की विफलता पर तीखे सवाल उत्पन्न कर रहा है।

अक्टूबर‑नवम्बर 2025 में हुए तेल की कीमतों में 35% की बढ़ोतरी के बाद, देश में पेट्रोल-डिज़ल पर औसत उपभोक्ता मूल्य में लगभग 8% की बढ़त देखी गई। इसी के साथ, आयात‑निर्भर बिजली और सिज़ल‑पावर के बिलों में भी तेज़ी से इजाफ़ा हुआ, जिससे अप्रैल 2026 में महंगाई दर 6.2% पर स्थिर रही, लेकिन हवा में ठहराव की स्थिति को बेहतर नहीं कहा जा सकता। केंद्र सरकार ने इस दबाव को हल करने के लिए LPG सब्सिडी, छोटे किसानों के लिए सजीव-ऊर्जा सहायता पैकेज, तथा नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश का वादा किया – परंतु ये कदम अक्सर “टेम्पररी बफ़र” ही बने हैं, जैसा कि कई आर्थिक विश्लेषकों ने तर्क किया।

विपक्षी दलों ने इस नीति पर तीखा रुख अपनाया। कांग्रेस ने RBI के इस “सुरक्षा‑कुश्ती” को “सरकारी मैक्रो‑नीति की असफलता का लक्षण” बताया, और कांग्रेसी राजनेता ने कहा कि “बिल्कुल भी नहीं, यह अस्थायी राहत के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक योजना के रूप में नई आर्थिक असमानता को गहरा बना रहा है।” बहुजन समाज पार्टी (भाजपा) ने भी “ऊर्जा शॉक के सामने शासकीय झुंड” का आरोप लगाया, जबकि कुछ राजनैतिक टिप्पणीकारों ने इसे “बैंकिंग प्रवृत्ति की अति‑संकल्पना” के रूप में देखें।

आलोचनात्मक दृष्टिकोण से, RBI की दर‑स्थिरता कई प्रमुख समस्याओं को छुपा रही है। पहली, दर को स्थिर रखने से मौद्रिक नीति का “सेट‑आइज़र” प्रभाव नहीं बन पाता, जिससे वित्तीय बाजार में सट्टा‑कोष का जोखिम बढ़ता है। दूसरी, ऊर्जा मूल्य के उछाल को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त वित्तीय साधनों का प्रयोग – जैसे कि लक्षित ईंधन सब्सिडी या सार्वजनिक‑निवेश‑संकल्प (पीआईएफ) – की आवश्यकता है, परंतु बजट में मौजूदा घाटे को देखते हुए ये उपाय व्यवहार्य नहीं लगते। तीसरी, इस नीति के पीछे “संतुलन” का दावा, सरकार के “विकास‑प्रोजेक्ट-आधारित” एजेंडे के साथ असंगत है, जहाँ अधोबिकास क्षेत्रों में कीमतों का बंधन नहीं, बल्कि मूल्य वृद्धि को बंदी मान कर हर्जाना दिया जा रहा है।

परिणामस्वरूप, उपभोक्ता वर्ग में असंतोष स्पष्ट है। न केवल मध्यम वर्ग, बल्कि छोटे व्यापारियों और कृषि उत्पादन श्रृंखलाओं को भी अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। कई राज्य‑स्तर के उपभोक्ता सर्वेक्षण ने संकेत दिया है कि आज के उपभोक्ता “पैसे‑की‑बल” को लेकर पहले से अधिक संवेदनशील हो गए हैं, और “ऊर्जा मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता” की माँग कर रहे हैं।

विचारणीय सवाल अभी भी बना है: क्या RBI की इस समयसीमा पर “उपरोक्त कीमतों को स्थिर रखने” की नीति, वास्तविक आर्थिक सुधारों के साथ तालमेल बिठा पाएगी? या यह केवल “रिपो‑दर को पेपर‑ट्रेंड पर रख कर” मौजूदा राजनीतिक खुफिया‑रणनीति को स्थिर करने का एक सतही उपाय रहेगा? आगामी विधानसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में, यह नीति‑निर्णय न केवल आर्थिक बल्कि राजनीतिक अंकुश भी लेगा, जहाँ “महंगाई‑मुक्ति” का वचन अब जमीनी स्तर पर परीक्षण का सामना कर रहा है।

Published: May 5, 2026