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उत्तर कोरिया ने नॉन‑प्रोलिफरेशन संधि से स्वतंत्रता का दावा किया, भारत की रणनीति पर नई चुनौतियां
प्यॉंगयांग ने हालिया बयान में कहा कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय परमाणु‑नॉन‑प्रोलिफरेशन संधि (NPT) से बंधा नहीं है और उसके न्यूक्लियर स्टेट की स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होगा, चाहे विदेशियों की कितनी भी रेटोरिक हो। यह दृढ़ता, जो उत्तर कोरिया के पहले‑से‑अधिक आक्रमक रुख को दर्शाती है, दक्षिण एशिया की सुरक्षा परिस्थितियों को फिर से सवालों के घेरे में ले आती है, विशेषकर भारत के नीतिगत विकल्पों पर।
भारत का अपना परमाणु अधिकार 1998 के पोखर परीक्षण के बाद अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित हुआ, जबकि वह NPT के तहत गैर‑सहस्ताक्षरी सदस्य है। भाजपा‑सरकार ने कई बार कहा है कि भारत "एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति" है और अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के अनुरूप ही शर्तों को स्वीकार करेगी। विपक्षी दल, विशेष रूप से कांग्रेस और राजनैतिक विपक्ष, ने इस पर सवाल उठाते हुए सरकार को अधिक पारदर्शी संवाद और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता की माँग की है।
उत्तरी कोरिया का ऐसा बयान, जब भारत अपनी आकांक्षी ‘सुरक्षा बैनर’ पर ‘डिफेंस पॉलिसी 2030’ को लागू करने की तैयारी में है, तो दो प्रमुख प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या भारत की मौजूदा ‘न्यायिक सिद्धांत’ (No First Use) और ‘परमाणु रिवर्सिबिलिटी’ के विचार NPT‑बाहर के राष्ट्रों के रुख से प्रभावित होंगे? दूसरा, क्या नई शिपिंग लाइन और दक्षिण‑कोरिया‑जापान के साथ द्वि‑स्तरीय सुरक्षा संवाद को फिर से तौलना पड़ेगा, ताकि संभावित प्रॉक्सी संघर्षों से बचा जा सके?
सरकार ने उत्तर कोरिया के बयान पर तत्काल कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन विदेश मंत्रालय ने खुला संकेत दिया कि भारत “क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय नियमों के सम्मान” को प्राथमिकता देता रहेगा। विपक्ष ने इस अवसर का फायदा उठाते हुए कहा कि विदेश मंत्रालय की मौनता यह दर्शाती है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक जोखिमों को कम करने में असमर्थ है। कई सांसदों ने संसद में सवाल उठाते हुए, “क्या भारत के पास पर्याप्त कूटनीतिक उपकरण हैं, जिससे वह नॉन‑प्रोलिफरेशन संधि‑बाहरी राज्य के साथ बातचीत करके अपनी सीमाओं को सुरक्षित रख सके?” कहा।
नीति‑विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर कोरिया की इस बयानी का भारत पर दोहरा असर होगा। एक ओर, यह भारत को अपनी ‘अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं’ के साथ पुनः संतुलन स्थापित करने का मौका देती है, जहाँ वह ‘परमाणु झंडा’ को वैध बनाते हुए विश्व मंच पर भरोसा जीत सकता है। दूसरी ओर, यह भारत को घरेलू तौर पर जवाबदेही के दबाव में धकेल सकता है, जहाँ विपक्षी दल सरकार की ‘परमाणु नीति’ को ‘अतियासीन’ या ‘असुरक्षित’ कह कर आलोचना करेंगे।
सार्वजनिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर रुचि बढ़ रही है। विभिन्न सामाजिक मंचों पर नागरिक जाँच रहे हैं कि क्या भारत अपने ‘परमाणु ऊर्जा’ के विस्तार को, जो जलवायु‑नीति के साथ जुड़ी है, को उत्तर कोरिया जैसे अनिश्चित सहयोगियों के साथ संरेखित करेगा। इस बीच, भारतीय मीडिया ने उत्तर कोरिया की ‘राष्ट्र‑स्वतंत्रता’ की दलील को ‘अंतरराष्ट्रीय शर्तों से बचाव’ के रूप में चित्रित किया है, जिससे सार्वजनिक विमर्श में फौजदारी, कूटनीति और सुरक्षा के बीच जटिल संतुलन को उजागर किया गया है।
ऐसे परिदृश्य में, भारतीय सरकार को न केवल कूटनीतिक चैनलों को सुदृढ़ करना होगा, बल्कि संसद में पारदर्शी बहस को भी प्रोत्साहित करना पड़ेगा, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को रणनीतिक स्थिरता के साथ जोड़ा जा सके। उत्तर कोरिया की नई रुख, भारत की मौजूदा नीतियों को ‘परिक्षा‑परीक्षण’ के चरण में रखता है, और यह सवाल कि क्या भारत ‘राष्ट्र‑रक्षा के शिल्पकार’ बने रहेंगे या ‘नियामक प्रतिबंधों’ के अधीन हो जाएगा, अभी बाकी है।
Published: May 7, 2026