उक्त्रेनी एंटी‑ड्रोन प्रणाली 'स्काई मैप' की खाड़ी में तैनाती पर सरकार‑विपक्ष में बंटे ध्रुवीकरण
यूक्रेन की युद्ध‑उपयोगिताओं से विकसित हुआ एंटी‑ड्रोन सिस्टम स्काई मैप अब खाड़ी के कुछ देशों में तैनात हो चुका है। सिस्टम के निर्माताओं के अनुसार, इस तकनीक में हजारों ध्वनिक सेंसर और इंटरसेप्टर मिलिट्री‑ग्रेड ड्रोन‑विरोधी क्षमताएँ सम्मिलित हैं, जो सतत निगरानी व लक्ष्य तक पहुँचने में सक्षम हैं।
भारत की रक्षा मंत्रालय ने हालिया रिपोर्टों में इस प्रणाली को ‘रणनीतिक महत्व’ के रूप में वर्गीकृत कर अपनी भागीदारी की अभिलाषा जताई है। प्रमुख समाचारपत्रों के अनुसार, विदेश मंत्रालय ने संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ प्रारम्भिक तकनीकी समझौतों पर चर्चा शुरू कर दी है, जिससे भारत की ‘खाड़ी के प्रति ऊर्जा एवं नागरिक सुरक्षा’ नीति को बूस्ट मिलने की उम्मीद है।
हालाँकि, इस पहल पर संसद में तीव्र बहस छिड़ गई है। ruling दल की ओर से यह कहा जा रहा है कि विदेशी तकनीक का प्रयोग भारत के रेफ़्यूएल‑प्रोजेक्ट्स के लिए आवश्यक ‘सुरक्षा कवच’ प्रदान करेगा, और यह पुनःओत्पादन तथा स्थानीय उत्पादन के लिये ‘मेक‑इन‑इंडिया’ के ढाँचे में रापा जाएगा। विरोधी दल इसको ‘केंद्रीय procurement प्रक्रिया के पारदर्शिता अभाव’ की ओर संकेत करते हुए सवाल उठाते हैं। वे विशेषकर अनुबंध की कुल लागत, जो लाखों डॉलर के स्तर पर अनुमानित है, को सार्वजनिक लेखा‑जाँच से बाहर रखने की आलोचना कर रहे हैं।
दूसरी ओर, चुनावी माहौल भी इस मुद्दे को ओवरले कर रहा है। सरकार के प्रमुख योजनाकार इस विकास को ‘विदेशी अनिश्चितता के बीच भारतीय नागरिकों की सुरक्षा’ को सुदृढ़ करने वाले ‘राष्ट्रीय तंत्र’ के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, जबकि विपक्षी नेता इसे ‘विदेशी एजेंडा के तहत राष्ट्रीय बजट को बर्बाद करने’ का आरोप लगा रहे हैं। दोनों पक्षों के बयानों में एक समान प्रवृत्ति देखी जा रही है – आर्थिक वर्चस्व और तंत्रिकीय सुरक्षा को राष्ट्रीय भावना के ढांचे में ढालना।
नीति‑विफलता के सवाल भी उभरे हैं। ‘स्काई मैप’ के समान तकनीकी विकल्पों को विकसित करने के लिये भारत में कई स्टार्ट‑अप और रक्षा निकाय सक्रिय हैं, परंतु उनका समर्थन न मिलने से यह तर्क उभरा है कि ‘विदेशी निर्यात पर निर्भरता’ को विघटित करने की राष्ट्रीय योजना कुण्डली में फँसी है। कई सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी प्रणाली का आयात मात्र अल्पकालिक समाधान हो सकता है, परन्तु दीर्घकालिक ‘स्वनिर्माण क्षमताओं’ को बाधित कर सकता है।
सार्वजनिक हित के पहलू को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। खाड़ी में काम करने वाले लाखों भारतीय प्रवासी, जिसकी सुरक्षा के लिए अब ‘स्काई मैप’ जैसे सिस्टम को तैनात करने का प्रस्ताव है, उनके जीवन‑सुरक्षा को लेकर इस नीति की वैधता पर सवाल उठता है। यदि प्रणाली को सफलतापूर्वक लागू किया गया, तो यह न केवल भारतीय कार्यबल की रक्षा करेगा, बल्कि भारत की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में संभावित ड्रोन‑आधारित खतरे को भी निरुत्तर कर सकेगा।
अंततः, ‘स्काई मैप’ की खाड़ी में तैनाती स्पष्ट करती है कि भारत अब भी अंतरराष्ट्रीय रक्षा प्रौद्योगिकी पर निर्भर है, जबकि घरेलू स्तर पर वैकल्पिक तकनीकों के विकास को लेकर राजनीतिक गतिशीलता तीव्र है। सरकार‑विपक्ष के बीच इस तकनीक को लेकर चल रही बहस, आगामी चुनावी परिदृश्य और सार्वजनिक सुरक्षा के प्रतिवाद को किस हद तक साकार करती है, यह अगले महीने की संसद सत्र में तय होगा।
Published: May 4, 2026