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Category: राजनीति

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ईरान पर इज़राइल‑यूएस संघर्ष ने सुरक्षा सिद्धांतों को झकझोर दिया: भारत को रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन की जरूरत

इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच ईरान को लक्षित करने वाले सैन्य अभियान ने मध्य‑पूर्व के सुरक्षा‑परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल दिया है। पहले जो ‘निवारक शक्ति’ और ‘स्थिरता की गारंटी’ माना जाता था, वह अब प्रश्नवाचक चिन्हों से घिर गया है, क्योंकि इस संघर्ष ने न केवल क्षेत्रीय तनाव को तेज किया, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतिरोध के मॉडल को भी धूमिल कर दिया।

वर्तमान में भारत ने इस प्रत्यक्ष टकराव में कूटनीतिक रूप से तटस्थ रुख अपनाया है, लेकिन दिल्ली की सुरक्षा‑नीति पर यह झटका गहरा असर डालता दिख रहा है। भारत‑अमेरिका रणनीतिक साझेदारी के तहत, न्यू‑डिफेंस बुनियादी ढांचे पर कई समझौते हुए हैं, जबकि इज़राइल के साथ रक्षा सहयोग इतिहासिक रूप से मजबूत रहा है। अब सवाल है कि क्या इन गठबंधनों की स्थिरता एक ‘दीप‑इम्पैक्ट’ संघर्ष के सामने टिक पाएगी।

सरकार ने पहले इस संघर्ष को ‘अस्थायी अस्थिरता’ कहकर तुच्छ कर दिया, यह दावा किया कि भारत का मुख्य ध्यान राष्ट्रीय सुरक्षा के मूलभूत पहलुओं पर है, जैसे समुद्री सुरक्षा और दक्षिण‑पश्चिमी सीमा पर आतंकवादी रुकावटें। विपक्षी दलों ने इस आश्वासन को ‘शर्तीय सुरक्षा नीति’ कह कर आलोचना की, यह तर्क देते हुए कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की स्थिति को स्पष्ट नहीं किया गया, जिससे निजी‑रक्षात्मक हितों को आगे बढ़ाने का जोखिम बढ़ा है।

नीति‑विश्लेषकों का मानना है कि इस प्रकार के उच्च‑स्तरीय सैन्य हस्तक्षेपों ने दो प्रमुख धारणाओं को उलट दिया है: पहले, ‘परमाणु प्रतिरोध’ को केवल तकनीकी क्षमता से ही नहीं, बल्कि भू‑राजनीतिक सुदृढ़ता से भी जोड़ा जा सकता है; दूसरा, ‘स्थिरता’ को प्रत्यक्ष बल प्रयोग के माध्यम से सुनिश्चित नहीं, बल्कि विविध外交 और बहुपक्षीय मंचों पर विश्वास रखने से हासिल किया जा सकता है। भारत को अब अपनी रणनीतिक पर्ची पर पुनर्विचार करना अनिवार्य हो गया है, विशेषकर ‘इंडो‑पैसिफिक’ परिप्रेक्ष्य को ‘वेस्ट एशिया‑डायनेमिक्स’ के साथ समक्रमित करने के संदर्भ में।

सार्वजनिक हित के विस्तार में देखी गई असंतोष की लहर भी इस रणनीतिक उलझन को उजागर करती है। मीडिया में बार‑बार यह प्रश्न उठाया जा रहा है कि यदि विदेशों में बड़े‑पैमाने के सैन्य हस्तक्षेप स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि जैसी घरेलू प्राथमिकताओं को दुर्लभ बना देते हैं, तो किस हद तक राष्ट्रीय सुरक्षा का वर्णन ‘रक्षा’ के रूप में किया जा सकता है। यह विश्लेषण ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक बहस को जन्म देता है, जहाँ नागरिक सुरक्षा को आर्थिक विकास के साथ संतुलन में रखना प्राथमिक चुनौती बन जाता है।

भविष्य की नीति‑दिशा का निर्धारण अब केवल सैन्य क्षमताओं की गणना पर नहीं, बल्कि कूटनीतिक लचीलापन, बहुपक्षीय सहयोग और प्रतिरोधात्मक रणनीति पर आधारित समग्र फ्रेमवर्क तैयार करने पर निर्भर करेगा। यदि भारत इस ‘रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन’ को समय पर अपनाता है, तो यह न केवल मध्य‑पूर्व में उभरती अनिश्चितताओं का सामना कर सकेगा, बल्कि अपनी अंतर्राष्ट्रीय छवि को भी ‘जिम्मेदार सत्ता’ के रूप में पुनः स्थापित कर सकेगा।

Published: May 6, 2026