ईरान के यूएई पर हमले को अंतरराष्ट्रीय निंदा, भारत की नीति पर सवाल
पिछले दिनों ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के कुछ बुनियादी ढांचे पर बमबारी की, जिस पर सौदियों, कूटनीतिक और आर्थिक स्तर पर एकत्रित प्रतिक्रिया मिली। सऊदी अरब, क़तर, कुवैत और बहरीन ने इस कदम को "खतरनाक तनाव" के रूप में इस्तीफा किया, जबकि जर्मनी, यूके और कनाडा ने ईरान को फिर से वार्ता प्रक्रिया में लाने का आह्वान किया।
गुच्छे में स्थित इस गिरते संघर्ष ने न केवल खाड़ी के सामरिक समीकरण को बल्कि भारत के रणनीतिक हितों को भी चुनौती दी। यूएस और ईरान के बीच वर्षों से चल रहे शीतलता के बीच, अब ईरान का यह साहसिक कदम मध्य-पूर्व में अस्थिरता के नए स्तर को दर्शाता है। भारत, जो अपनी ऊर्जा आपूर्ति के 70% से अधिक के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है, इस विकास को अनदेखा नहीं कर सकता।
वर्तमान में दिल्ली-मुख्य रूप से दो मोर्चे पर खड़ी दिखाई देती है। एक ओर, भारत ने यूएई एवं सऊदी सहित सभी खाड़ी देशों के साथ परमाणु ऊर्जा, सुरक्षा और व्यापार के संदर्भ में घनिष्ठ गठबंधन बनाए रखा है। दूसरी ओर, ईरान के साथ निरंतर संवाद बनाए रखना, विशेषकर इरानी परमाणु समझौते की स्थिति को देखते हुए, एक कूटनीतिक संतुलन का प्रश्न बन जाता है। अभिप्रेत है कि भारत इस बीच किसी भी एक पक्ष के साथ स्पष्ट तौर पर झुकाव नहीं दिखाए, जिससे उसे विरोधियों की “धोखेबाज़ी” की घिसी-पूरी लहर का सामना करना पड़ेगा।
विपक्ष दलों ने इस पर खुली सवाल उठाए हैं। कांग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता ने कहा कि भारतीय सरकार ने इस अंतरराष्ट्रीय संकट पर “अनिच्छा” दिखाई है, जिससे भारत के विदेश नीति में स्पष्ट दिशा का अभाव दिखता है। वहीं, राष्ट्रीय जनता पार्टी (एनएपी) ने विदेश मंत्रालय से मांगा है कि वह आधे-आधे में नहीं, बल्कि “समान्य नीति” के तहत खाड़ी में सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करे, जिससे भारतीय नौसेना की तैनाती का विस्तार हो।
उपभोक्ता और उद्योग क्षेत्र भी इस अस्थिरता से चिंतित है। तेल और गैस आयातकों के अनुसार, यूएई के प्रमुख पोर्टों के संभावित नुकसान से तेल की कीमतों में अचानक उछाल और निर्यात श्रृंखला में बाधा आ सकती है। यह परिदृश्य भारत के ऊर्जा महंगाई को दुगना कर सकता है, जिससे आम जन को भोगना पड़ेगा।
अंत में, अंतरराष्ट्रीय समुदाय की कड़ी निंदा के बावजूद भारत की प्रतिक्रिया में अभी तक एक निर्णायक स्वर नहीं सुनाई दिया। यह ही वह क्षण है, जब “संतुलन” शब्द की वास्तविकता पर सवाल उठते हैं—क्या यह शब्द केवल कूटनीति की एक औपचारिक परत है, या फिर भारत की विदेश नीति की वास्तविक दिशा-निर्देश है? समय आने पर स्पष्ट होगा कि दिल्ली इस “खतरनाक एस्केलेशन” का जवाब किस रूप में देगी, और किन मूल्यों के साथ।
Published: May 5, 2026