ईरान के द्वितीय दिन के हमलों ने यूएई में तनाव बढ़ाया, भारत की बाहरी नीति पर सवाल उठे
गुज़रते शनिवार, ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पर बड़े पैमाने पर दो‑दिवसीय मिसाइल हमले किए, जिसके बाद आज फिर से दुश्मनी की सीमा पार की गई। इस क्रम में पिछले 24 घंटों में यूएई के विभिन्न सैन्य स्थलों पर 15 मिसाइल गिराई गईं, जबकि आज दुबई के निकट के समुद्री क्षेत्र में कम से कम पाँच अतिरिक्त प्रोजेक्टाइल लैंड कर गये। दोनों पक्षों ने होने वाले क्षति की विस्तृत आँकड़े नहीं दिए, पर स्थानीय स्रोतों के अनुसार कई ढाँचों में क्षति दर्ज हुई है।
इन घटनाक्रमों का सीधा संबंध अमेरिका‑ईरान के बीच अस्थिर शीतकालीन संधि‑समाप्ति पर बना है। पिछले हफ़्ते दोनों देशों के बीच वार्ता के बाद अस्थायी "स्थगित संघर्ष" समझौता हुआ था, परन्तु इस समझौते की जाँच‑परख निरंतर सवालों के घेरे में रही। यूएई ने इस समझौते को समर्थन नहीं दिया और ईरान को सीमा‑पार सुरक्षा को लेकर उत्तरदायी ठहराया। इस प्रकार, ईरान के लगातार हमले शांति‑संघर्ष की दोहरी जाँच को और भी तीव्र कर रहे हैं।
भारत की विदेश नीति को अब इस तनाव के सन्दर्भ में दोहरी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। यूएई भारत का प्रमुख तेल आयात स्रोत तथा भारतीय प्रावासी और व्यापारिक संरचनाओं का अहम केंद्र है। दुबई‑और‑अबू धाबी में लगभग ७०‑से‑80 लाख भारतीय प्रयोगशालाएँ, छोटे‑बड़े व्यवसायी और बहु‑राष्ट्रीय कंपनियों के मुख्यालय स्थित हैं। इन विकास क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर भारत के विदेश मंत्रालय ने अभी‑अभी एक संक्षिप्त बयान जारी किया, जिसमें कहा गया कि "सभी पक्षों से तुरंत हिंसा बंद करने और कूटनीतिक समाधान की तलाश करने का आग्रह किया जाता है"। हालांकि, इस बयान में स्पष्ट रूप से किसी भी पक्ष को दायित्व नहीं सौंपा गया, जिससे विपक्षी दलों ने इसे "अस्पष्ट कूटनीति" के रूप में खारिज किया।
विपक्षी पार्टियों ने सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत का मध्य‑पूर्व में दोहरी नीति—अमेरिका के साथ सामरिक सहयोग और साथ ही यूएई‑सऊदी अरब जैसी धनी मित्रों के प्रति आर्थिक निर्भरता—अस्थिरता को जन्म दे रही है। कई सांसदों ने विदेश मंत्री को त्वरित दखल की मांग की, विशेषकर भारतीय कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने और तेल सप्लाई चैन को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से भारतीय नौसैनिक बलों की तैनाती के प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिये। विरोधी दलों का तर्क है कि सिर्फ बयानबाजी से जमीनी सुरक्षा की गारंटी नहीं मिल सकती, और अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत को तेल की कीमतों में उछाल, वस्तु मूल्यों में वृद्धि और निर्यात‑आधारित उद्योगों में बाधा का सामना करना पड़ेगा।
वर्तमान में भारतीय ऊर्जा विभाग ने अनिश्चितता के मद्देनज़र अतिरिक्त रणनीतिक तेल भंडार भरने का इशारा किया है, परन्तु यह कदम भी बाजार में अस्थिरता के कारण औसत कीमतों में ६‑८ प्रतिशत वृद्धि की आशंका को नहीं रोक पा रहा है। साथ ही, भारतीय कंपनी‑संघ ने भारतीय प्रवासी समुदाय की सुरक्षा को लेकर विशेष बॉर्डर‑सुरक्षा एलॉरेन्स की मांग की, यह दर्शाता है कि आर्थिक हित ही नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा भी इस विवाद का बुनियादी पहलू बन गई है।
सारांशतः, ईरान द्वारा यूएई पर लगातार हुए हमलों ने न सिर्फ क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रश्नचिह्न लगाये हैं, बल्कि भारत के मध्य‑पूर्व नीति में भी नई जाँच के द्वार खोल दिए हैं। सरकार का जमीनी कार्रवाई में धीमा कदम, विपक्ष की कूटनीतिक स्पष्टता की माँग और सार्वजनिक हित के मूल्यांकन के बीच बन रहा है एक जटिल समीकरण, जिस पर आगे के दिनों में निर्णयात्मक कदमों की आवश्यकता स्पष्ट है।
Published: May 5, 2026