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Category: राजनीति

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इरान ने होंरमुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित पारगमन का आश्वासन दिया, अमेरिकी ऑपरेशन में विराम के बाद

इज़रायली-क्रांतिकारी मोहराबा गार्ड (IRGC) की नौसैनिक शाखा ने मंगलवार को कहा कि वह होंरमुज जलडमरूमध्य के पारगमन को "सुरक्षित" बनाए रखने के लिये नई संचालनात्मक प्रक्रियाएँ लागू कर रही है। यह बयान अमेरिका के इस क्षेत्र में चल रहे एक बड़े पैमाने के नौसैनिक अभ्यास को अस्थायी रूप से रोकने के तुरंत बाद आया।

होंरमुज विश्व तेल व्यापार का एक महत्वपूर्ण फिशन है, जहाँ रोज़ाना लगभग दो‑तीन मिलियन बैरल कच्चा तेल गुजरता है। इसलिए, अमेरिकी की इस कार्रवाई को क्षेत्रीय सुरक्षा के एक परीक्षण के रूप में पढ़ा गया, जबकि इराक ने इसे "इरानी समुद्री संप्रभुता" और "सागरी स्थिरता" के मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया। इस परिप्रेक्ष्य में, इराक द्वारा प्रस्तावित नई प्रक्रियाओं में उन्नत निगरानी, आपातकालीन डिस्टेंसिंग और द्विपक्षीय संचार प्रोटोकॉल शामिल हैं, जैसा कि IRGC के आधिकारिक बयान में कहा गया।

भारत के पास इस जलडमरूमध्य के माध्यम से प्रतिदिन लगभग 400,000 बैरल कच्चा तेल का आयात है, जिससे राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा सीधे इस मार्ग की स्थिरता से जुड़ी है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह इस विकास को "नज़दीकी निगरानी" कर रही है और किसी भी व्यवधान को रोकने हेतु अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत कार्रवाई करेगी। लेकिन विपक्षी दलों ने इस अवसर का उपयोग केंद्र सरकार की जलसंकट प्रबंधन में कमी पर सवाल उठाने के लिये किया।

विपक्ष की आलोचना का मुख्य बिंदु यह है कि भारत ने पहले भी अभूतपूर्व तेल कीमतों के समय में “होंरमुज सुरक्षित” बयानों को आम तौर पर सरकारी प्रवक्ता से सुना था, परंतु वास्तविक प्रायोगिक उपायों की कमी से जनता को भारी महंगाई झेलनी पड़ी। इस बार, विदेश शास्त्रियों ने कहा कि भारत को सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि सैद्धांतिक रूप से सुदृढ़ समुद्री सुरक्षा व्यवस्था में योगदान देना होगा – जैसे बहुपक्षीय निगरानी अभ्यास या भारत‑इंडो‑पैसिफिक सहयोगियों के साथ संयुक्त रूट‑प्लानिंग।

अमेरिकी पक्ष से, ऑपरेशन में विराम का कारण आधिकारिक रूप से "आपराधिक आशंकाओं को कम करने के लिये" बताया गया, परंतु सैन्य विश्लेषकों ने इसे इरान के प्रतिबंध-उत्तेजक क्षुद्र रॉकेट परीक्षण के जवाब में माना है। इस प्रकार, दोनों पक्षों के बयानों में अक्सर एक ही समय में सुरक्षा और वैधता दोनों का दावा दिखता है, जबकि वास्तविक कार्यवाही अक्सर अलग दिशा में चलती है।

नीति‑प्रभाव के पहलू से देखा जाए तो, इरान की नई प्रक्रिया यदि प्रभावी सिद्ध हुई तो अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों के भरोसे को बहाल कर सकती है, जिससे तेल की कीमतों में स्थिरता आ सकती है। अन्यथा, दुबारा आगे बढ़ा हुआ अमेरिकी नौसैनिक अभ्यास क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा सकता है, जिससे भारत जैसे आयात‑निर्भर देशों को आर्थिक झटके का सामना करना पड़ सकता है।

सार रूप में, होंरमुज के इस गंभीर मोड़ पर इरान का भरोसा, अमेरिकी अस्थायी विराम, तथा भारत की नीति‑जागरूक प्रतिक्रिया आपस में जुड़ी धागों जैसा खेल रहे हैं। इस बहु‑पार्श्विक तनाव को केवल सैन्य शब्दों से नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और जनता के रोज़मर्रा की लागत पर पड़ने वाले प्रभावों के दृष्टिकोण से जांचना आवश्यक है।

Published: May 6, 2026