विज्ञापन
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?
आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें।
इराक में ज़िग्गुरात उर की पारम्परिक बहाली, भारत की धरोहर सुरक्षा नीति पर सवाल उठते हैं
मध्य पूर्व के शहज्राबाद में स्थित प्राचीन ज़िग्गुरात उर के पुनर्स्थापन कार्य, जो शताब्दियों‑पुरानी निर्माण विधियों से किया जा रहा है, ने अंतरराष्ट्रीय संरक्षण समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। किंतु भारत के भीतर यह घटना मात्र ऐतिहासिक पहल नहीं बनी; यह भारतीय राजनीति में धरोहर संरक्षण को लेकर चल रही विफलताओं और सरकार‑विपक्ष के बीच के टकराव की लकीर को भी उजागर करती है।
इराक की सरकारी एजेंसी ने स्थानीय कारीगरों को पुनः नियुक्त करके ईंट‑बनाने, जलवायु‑अनुकूल मिश्रण और मौलिक आकार‑निर्धारण को पुनर्जीवित किया, जबकि आधुनिक तकनीक को न्यूनतम रखा। इस पारम्परिक दृष्टिकोण को व्यापक प्रशंसा मिली, क्योंकि यह स्थानीय आजीविका को सुदृढ़ करता है और समग्र समानता सिद्धांतों के अनुरूप है। भारत में वैसी ही नीति‑परवरिश कई सालों से मौखिक वादे में उलझी हुई है, पर साकार नहीं हुई।
वर्तमान केंद्र सरकार ने पिछले दो सालों में राष्ट्रीय धरोहर बजट में 12% की कटौती का औचित्य जलवायु‑अनुकूलता और डिजिटल संरक्षण के नाम पर दिया। विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस और अहेँड पार्टी, इस कटौती को “इतिहास को रीढ़‑भंग करने का व्यवस्थित इरादा” कहकर उजागर कर रहे हैं। उन्होंने सरकार पर सवाल उठाया कि कब तक आयरन‑डॉमेस्टिक “जुड़वां” परिदृश्य में पुरातत्विक स्थलों को बुनियादी रखरखाव से बाहर कर दिया गया।
आगामी 2029 के आम चुनाव के मुद्दों में से एक धरोहर संरक्षण है, जिस पर कई राज्य सरकारें भी अपनी नीतियों को पुनः देख रही हैं। कुछ राज्य, जैसे उत्तराखंड, ने स्थानीय कारीगरों को एकीकृत करके कुटुंबिक किलों की पुनर्स्थापना में सफल रहे हैं, परंतु अधिकांश में ‘बड़े‑बड़े भवन, छोटी‑छोटी देखभाल’ की असमानता बनी हुई है। यह असंतुलन राष्ट्रीय स्तर पर “पारम्परिक तकनीकों को अपनाने की इच्छा बनाम औद्योगिक‑बजट की अनिच्छा” के संकेत देता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इराक में ऐसी बहाली न केवल सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करती है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सुदृढ़ीकरण का एक मॉडल पेश करती है। भारत के लिए यह संकेत है कि यदि सरकार बजट कटौती के साथ ही “डिजिटल प्रथम” पर ज़ोर देती रहे, तो वह कारीगर वर्ग को बाहर करके धरोहर संरक्षण को केवल “पर्यटन‑उत्पाद” तक सीमित कर सकता है।
विपक्ष ने इस अवसर का उपयोग करके केंद्र को “इतिहास के प्रति उनकी उदासीनता” का आरोप लगाया, जबकि मुख्य विपक्षी नेता ने कहा—“यदि हमें इराक में प्राचीन निर्माण के मूल विधियों को पुनर्जीवित करने की अनुमति मिलती है, तो हमें अपने ही ऐतिहासिक स्मारकों को उसी रीति से बचाना चाहिए।” यह कथन सरकार के बुनियादी दायित्व का परीक्षण बन गया है।
सारांश में, इराक की ज़िग्गुरात उर की पारम्परिक बहाली सिर्फ एक पुरातत्वीय सफलता नहीं, बल्कि भारत में धरोहर नीति, वित्तीय प्राथमिकता और चुनावी वार्तालापों के बीच एक नई ज्वार का प्रतीक बन गई है। अगले वर्ष के बजट में इस बहस का किस हद तक प्रतिबिंब दिखेगा, यही देखना बाकी है।
Published: May 7, 2026