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इज़राइल के हमले में लेबनानी वृद्ध को बचाया गया, भारत की विदेश नीति पर उठे सवाल
इज़राइल ने लेबनान के दक्षिणी हिस्से में किए गए एक हवाई हमले में एक घर के ध्वस्त खंडहरों में फंसे 80 वर्षीय बुजुर्ग को बचाने के लिए स्थानीय बचाव दल को बुलाया गया। कई घंटों की कठिनाई के बाद वह अंततः बचाव में सफल रहा, लेकिन यह घटना नागरिकों की सुरक्षा के बारे में गंभीर प्रश्न उठाती है।
उस समय, भारत की सार्वजनिक चर्चा ने इस दुर्लभ मानवता‑के‑साइड‑इफ़ेक्ट को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में रख दिया। वर्तमान में केंद्र सरकार इज़राइल के साथ अपने रणनीतिक साझेदारी को सुदृढ़ करने के लिए कई कदम उठा रही है, जबकि विपक्ष इस दिशा को मानवीय सिद्धांतों के साथ टकराव मानता है।
विपक्षी दलों ने ताजा घटनाक्रम को 'सैन्य सहयोग का राजनैतिक दांव' करार देते हुए कहा कि भारत को इज़राइल के सैन्य आक्रमणों के समय अंतर्राष्ट्रीय कानून का पालन करने की दिशा में स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए। वे यह भी तर्क देते हैं कि चुनाव के समीप आने वाले इस समय में सरकार का ऐसा रुख राष्ट्रीय सुरक्षा की बहाने से मानवीय कीमतों को नज़रअंदाज़ कर रहा है।
दूसरी ओर, केंद्रीय विदेश मंत्रालय ने अभी तक इस घटना पर औपचारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में इज़राइल‑हामास संघर्ष में अपनी तरफ़ से 'रक्षा‑सुरक्षा' के स्वागत योग्य सहयोग का दोहराव किया गया है। इस नीति को कुछ विशेषज्ञों ने भारत की विदेश नीति में निरपेक्षता के अभाव की ओर इंगित किया है, जहाँ रणनीतिक हितों को मानवीय नैतिकता के साथ संतुलित करना अनिवार्य हो गया है।
जनता के बीच इस मुद्दे पर गहरी चिंता देखी जा रही है। कई नागरिक समाज संगठनों ने संयुक्त राष्ट्र को लेबनान में नागरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की पुकार उठाई है और साथ ही भारत को भी इस दिशा में अपनी आवाज़ उठाने की मांग की है। यदि सरकार इस क्षेत्र में निरन्तर सहयोग को जारी रखती है, तो भीतर से उठते इस आलोचनात्मक ध्वनि को अनदेखा करना भविष्य में राजनैतिक लागत बढ़ा सकता है।
अंततः, इज़राइल की उस मार ने एक बुजुर्ग को जीवन बचाने की अद्भुत कहानी को उजागर किया, पर साथ ही यह भी दर्शाया कि वैश्विक संघर्षों की लकीरें भारतीय राजनीति को कितना प्रभावित कर रही हैं। सरकार को अब यह तय करना होगा कि रणनीतिक गठबंधन के साथ-साथ मानवीय मूल्य क्या बने रहेंगे, और विपक्ष को यह देखना होगा कि क्या यह मुद्दा सार्वजनिक हित के लिए एक ठोस बदलाव का उत्प्रेरक बन पाता है।
Published: May 6, 2026