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इज़राइल के हमले और दबाव से लेबनान में गहरी फूट, राजनीतिक संकट और सुरक्षा जोखिम बढ़े
इज़राइल ने पिछले कुछ हफ्तों में लेबनान के कई क्षेत्रों में सटीक विमानबंद और ड्रोन हमले किए हैं। आधिकारिक तौर पर इन हमलों को हीज़राकुज (Hezbollah) के मिलिटरी बुनियादी ढाँचा तोड़ने के इरादे से कहा गया है, परंतु विशेषज्ञों का कहना है कि इस रणनीति का वास्तविक लक्ष्य लेबनान की अस्थिर राजनीतिक संरचना को और तोड़‑फोड़ कर, काबिल‑इ‑समझौते पर बलपूर्वक समझौता करवाना है।
लेबनान की मौजूदा राजनीति पहले से ही आर्थिक मंदी, भ्रष्टाचार और सैकड़ों हजारों नागरिकों के बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहने के कारण ध्रुवीकरण की कगार पर है। इस पर इज़राइल के लगातार सेना‑आधारित दबाव ने मौजूदा सदियों‑पुराने संधि-तंत्र को खतरे में डाल दिया है। कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इज़राइल इस समय लेबनान के दो मुख्य शक्ति‑पुंज – सीमावर्ती स्मारक (सीना) के तहत शिया‑प्रमुख दल और शिया‑प्रमुख दल के भीतर सत्ता‑संतुलन को तोड़‑फोड़ कर, अपने रणनीतिक लक्ष्यों को हासिल करना चाहता है।
लेबनान की सरकार ने इन हमलों की कड़ी निंदा की, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से तत्काल हिट‑एंड‑रन को रोकने की मांग की और इज़राइल के साथ शांति वार्ता के पुनः आरम्भ की पुकार की। परंतु विपक्षी दलों ने आलोचना का तीर वापस सरकार की ओर ही मढ़ दिया, इसे “सुरक्षा‑निरंकुश” और “पर्याप्त आत्मरक्षा न कर पाने” का आरोप लगाया। विपक्षियों का यह कहना है कि सरकार अपने भीतर की फूट को बँध कर विदेश में सुरक्षा नीति तैयार करने में असफल रही है।
दूसरी ओर, इज़राइल के राजनीतिक प्रतिनिधियों ने यह तर्क दिया कि उनका प्रत्येक प्रहार “हथियार‑कौशल्य” की सीमा में है और यह “लेबनान के भीतर मौजूद हथियार‑भंडार को समाप्त करने” के निर्देश पर किया गया है। ऐसी दलील के सामने अंतरराष्ट्रीय समीक्षकों ने इज़राइल की “अभिकथित सुरक्षा‑पहल” को “दहशत‑रहित नीतियों” की छाया में देखना शुरू कर दिया है।
भारत के लिए इस परिप्रेक्ष्य का महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि भारत ने लेबनान में अपने 6,000 से अधिक विदेशियों को सुरक्षित रखने के लिए कूटनीति और संभावित एम्बेसेडरी निकासी योजना तैयार की है। बहु‑राष्ट्रीय कंपनियों ने इस तनाव को देखते हुए अपने निवेश को पुनः‑विचार किया है और कई व्यापारिक प्रतिनिधियों ने कहा है कि “स्थिरता के बिना आर्थिक सहयोग अधूरा है”। इस पर सरकारी जवाबदेही का सवाल तब और उभरता है जब भारत के विदेश मंत्रालय को लेबनान में लगातार बढ़ती सुरक्षा खतरे के बीच भारतीय नागरिकों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाने को कहा जा रहा है।
संक्षेप में, इज़राइल के लगातार सैन्य दबाव ने लेबनान के भीतर मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक विभाजन को और तीव्र कर दिया है। विशेषज्ञ इस बात को दोहराते हैं कि “दबाव की रणनीति तब सफल होती है जब लक्ष्य स्पष्ट हो: वह है अंतर-राज्यीय समझौते पर बलपूर्वक झटका देना।” यदि इस दिशा में कोई दीर्घकालिक समाधान नहीं निकाला गया, तो लेबनान के राजनीतिक मंच पर और अधिक ध्रुवीकरण, आर्थिक अंधकार और क्षेत्रीय असुरक्षा का नया दौर शुरू हो सकता है—जिसका असर भारत सहित पूरे दक्षिण‑एशिया के भू‑राजनीतिक संतुलन पर पड़ेगा।
Published: May 8, 2026