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इज़राइल के गाज़ा हमले में एक की मौत, हमास के अल‑हय्या के बेटे को गंभीर आघात
इज़राइल द्वारा गाज़ा शहर में किए गए हालिया वायु हमले में एक नागरिक की मृत्यु हो गई और हमास के वरिष्ठ कार्यकर्ता खलील अल‑हय्या के बेटे अज़ज़ाम को गंभीर रूप से घायल कर दिया गया। खलील अल‑हय्या ने इंटरफ़ोन के माध्यम से बताया कि उनका बेटा अब गंभीर स्थिति में है और उसकी उपचार व्यवस्था के लिए पारिवारिक संसाधनों को जुटाना पड़ रहा है। यह घटना अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तनाव को फिर से बढ़ा रही है, जबकि भारत की विदेश नीति इस दिशा में अपरिवर्तित दिख रही है।
वर्तमान में, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक रूप से कहा है कि भारत ‘शांति एवं स्थिरता’ के पक्ष में है और दोनों पक्षों से ‘विवाद को शांति‑पूर्ण समाधान’ की अपील की है। कहा गया कि भारत मानता है कि ‘इज़राइल का आत्मरक्षा अधिकार वैध है’, जबकि साथ ही मानवीय स्थितियों का ‘गंभीर ध्यान’ रखने की ज़रूरत पर बल दिया गया। यह दोहरा संदेश भाजपा‑निर्देशित सरकार के भीतर एक वैध रणनीतिक संतुलन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, परन्तु विपक्षी दल इसे ‘धोखेबाज़ी’ का आरोप लगाते हैं।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष सारा न्दत ने तुरंत इस घटना पर सवाल उठाते हुए कहा, “जब हजारों मृत्युदंड और बंधक नागरिकों की बात हो रही है, तब ‘आत्मरक्षा’ के बहाने पर हमास के पारिवारिक सदस्यों को घायल होने देना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।” कांग्रेस ने विदेश मंत्रालय को ‘मानवीय पक्ष को प्राथमिकता देने’ की कड़ी मांग की और इज़राइल के साथ भारत के ‘सैन्य सहयोग’ को ‘कूटनीतिक रूप से पुनर्विचार’ का आग्रह किया।
यह तर्क-वितर्क खासकर आगामी राज्य‑संसद चुनावों के माहौल में और अधिक तीव्र हो गया है। भाजपा की अधिकतम मतदाताओं की अपेक्षा है कि वह ‘इज़राइल के साथ रक्षा सहयोग’ को जारी रखे, जबकि सीमित जनसमूह, विशेष रूप से दिल्ली‑मुंबई जैसे बड़े शहरों में, संयुक्त राष्ट्र द्वारा गाज़ा में ‘मानवीय संकट’ की दृढ़ नज़र से देखी जा रही है। इस बीच विभिन्न गैर‑सरकारी संगठनों ने भारतीय बिंदुओं को ‘नीतिगत असंगतता’ का आरोप लगाते हुए, युद्ध‑क्षेत्र में मानवाधिकार उल्लंघनों पर भारत की ‘सुस्पष्ट नीति’ की मांग की है।
पिछले दो दशकों में भारत ने इज़राइल के साथ रक्षा समझौते को कई बार नवीनीकरण किया है, असेंबली में वार्षिक संयुक्त अभ्यास भी होते रहे हैं। आलोचक कहते हैं कि यह सहयोग ‘रणनीतिक व्यापार’ के कवरेज में फँस गया है, जबकि साथ ही ‘मानवीय मुद्दों’ को राजनीतिक उपकरण बनाकर उपयोग किया जाता है। इसलिए, अब सवाल यह है कि भारत की विदेश नीति ने कब ‘सुरक्षा’ को ‘नैतिक दायित्व’ के साथ संतुलित किया, और कब वह वही नीति‑डिज़ाइन बनाती रहती है जो विदेश में ‘व्यवहारिक’ और घर में ‘आलोचनात्मक’ दोनों हो।
जैसे ही अंतर्राष्ट्रीय समुदाय गाज़ा में बढ़ती रक्तरंजित स्थिति पर चिंतित हो रहा है, भारतीय राजनीतिक मंच पर यह घटना दो प्रश्न उजागर कर रही है: क्या भारत अपनी ‘गैर‑सामरिक’ बहुपक्षीय छवि को बनाए रख पाएगा, और क्या वह ‘मानवाधिकार‑प्रमुख’ विदेश नीति के लिए वास्तविक कदम उठा पाएगा, न कि सिर्फ वक्तव्य‑आधारित प्रतिकृति। इस मोड़ पर, सार्वजनिक राय, मीडिया की सतर्कता और अंतर्राष्ट्रीय दबाव मिलकर भारतीय नीति निर्माताओं के लिये एक कठिन जाँच‑पड़ताल का मंच तैयार कर रहे हैं।
Published: May 7, 2026