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Category: राजनीति

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इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स के चुनावों में अंतिम मतदान रैली: ब्रिटिश पार्टियों की आखिरी धावा

जैसे ही मतदान के दो दिन शेष हैं, इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स में राजनीतिक दलों ने अपने ‘अंतिम धावा’ के रूप में जनसमूह को इकट्ठा किया है। मुख्यतः तीन बड़े चुनावीय लड़ाइयों—कांग्रेस को पुनः सत्ता की ओर धकेलने की टोरी, स्कॉटिश नेशनल पार्टी (SNP) की स्वतंत्रता को दोबारा मान्य करने की पुकार, और वेल्श राष्ट्रीयतावाद के लिए प्लैड क्मरड्य की सँभाला—में प्रत्येक दल अपने‑अपने मुद्दों को आज़माने का अभ्यास कर रहा है।

वर्तमान कांग्रेस सरकार, जो हाल के आर्थिक मंदी के कारण निरंतर आलोचना का केंद्र रही है, ने शेष समय में ‘सार्वजनिक सेवाओं का पुनर्निर्माण’ और ‘रोज़गार‑पर‑मुख्य आर्थिक रणनीति’ को मौखिक रूप से उजागर किया। परन्तु कई जातीय क्षेत्रों में यह स्पष्ट हो रहा है कि इन दावों का आधार असमान है: जहाँ दक्षिणी इंग्लैंड में औद्योगिक पुनर्जीवन की आशा है, वहीं उत्तर में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं के लगातार ख़राब होते स्तर ने मतदाताओं को ‘आर्थिक असमानता’ के प्रतिरूप के रूप में देखना शुरू कर दिया है।

विपक्षी लेबर पार्टी ने ‘राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (NHS) को पुनर्स्थापित करने’ और ‘सामाजिक सुरक्षा को विस्तारित करने’ के वादे से ‘समाज‑वर्गीय बहुमत’ को आकर्षित करने की कोशिश की। लेकिन इस वर्ष के चुनावी बजट में सामाजिक कल्याण खर्च में केवल 2.3% की बढ़ोतरी ने उनके वादों को ‘भारी-भारी बोगस’ के रूप में दिखा दिया। इस बीच, कई साक्षात्कारों में मतदाता इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि लेबर का ‘वायदा-प्रकाश’ अक्सर ‘भ्रष्टाचार‑संकट’ और ‘संपत्ति‑हिन’ के साथ जुड़ा रहता है, जिससे उनका भरोसा घट रहा है।

स्कॉटिश नेशनल पार्टी ने उल्लेखनीय रूप से ‘स्वतंत्रता‑संविधान के नवीनीकरण’ के शब्दों को दोहराया, जबकि हाल ही में यूरोपीय संदर्भ में प्रदर्शित ‘ब्रेस्ट‑फ्रिट’ का असफल परिणाम स्कॉटलैंड में भी अनिश्चितता पैदा कर रहा है। SNP के नेता ने यह तर्क दिया कि ‘ब्रेक्ज़िट की विफलता’ स्कॉटिश लोगों को यूरोपीय एकीकरण की ओर वापस ले जाएगी, परन्तु इस दावे का ठोस आँकड़ा नहीं दिख रहा, जिससे ‘स्वतंत्रता‑रजत खराद’ का विवाद फिर से उभरा है।

वेल्श राष्ट्रवादी प्लैड क्मरड्य ने ‘वेल्स‑विशिष्ट विकास योजनाएँ’ को प्रमुख प्राथमिकता दी, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में ‘डिजिटल बुनियादी ढाँचा’ और ‘हरित ऊर्जा’ पर। परन्तु उनके पिछले प्रतिबद्धताओं में ‘भुगतान‑पर‑आधारित शिक्षा नीति’ का निरसन और ‘स्थानीय करों में कटौती’ का अभाव स्पष्ट करता है कि वेल्श पार्लियामेंट में भी नीति‑निर्धारण अभिवृद्धि के बजाय ‘राजनीतिक धुंधली’ के रूप में बनी हुई है।

इन अभियानों के बीच, भारत के मुख्य विपक्षी दलों और सिविल सोसाइटी समूहों ने भी ब्रिटिश चुनाव की नज़र से देखी, यह नोट करते हुए कि ‘अधिकांश बहुपार्टी लोकतंत्रों में ‘सिंघासन‑की‑पुकार’ का स्वर अभी भी नीचे नहीं पहुंचा। भारतीय मीडिया ने कई बार कहा कि ‘परिणाम चाहे जो भी हो, ब्रिटेन की राजनीति में देखी गई ‘सुरक्षा‑पर‑आधारित राजनीति’ की धुरी भारत के चुनावी ध्येय को पुनःपरिभाषित कर सकती है।’

इसी प्रकार, नीतियों की प्रभावशीलता पर सवाल उठाते हुए कई वैज्ञानिक और पर्यावरणीय समूहों ने यह चेतावनी दी है कि ‘इंग्लैंड‑स्कॉटलैंड‑वेल्स’ के चुनावी मंच में ‘जलवायु‑नीति’ को केवल ‘राजनीतिक पक्षपात’ का उपकरण बनाकर पेश किया जा रहा है, जबकि वास्तविक CO₂ उत्सर्जन घटाव की दिशा‑निर्देश अभी भी असंगत हैं।

समग्र रूप में, यह कहा जा सकता है कि अंतिम दिन की प्रचार-रोडशो में प्रत्येक पार्टी ने अपने‑अपने ‘संदेश‑पुश’ पर ध्यान केंद्रित किया है, परन्तु जनता के बीच व्यापक असंतोष, नीति‑विलंब और प्रशासनिक उत्तरदायित्व की कमी एक समान देखी जा रही है। चुनाव का परिणाम चाहे कुछ भी हो, ये स्पष्ट है कि आगामी सरकार को ‘निर्धारित नीति‑कार्यान्वयन’ तथा ‘जनसाधारण के विश्वास को पुनर्स्थापित करने’ की चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

Published: May 6, 2026