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Category: राजनीति

अमेरिकी पेट्रोल कीमतों में 50 % उछाल, भारत की ऊर्जा नीति पर बढ़ता सवाल

अमेरिकी मोटरिंग नेटवर्क में पेट्रोल की औसत कीमत $4.48 प्रति गैलन तक पहुँच गई, यानी इरान के खिलाफ शुरू हुए संघर्ष से पहले के स्तर से लगभग आधी गुना अधिक। यह आकड़ा सिर्फ एक विदेशी बाजार में कीमत के उतार-चढ़ाव को नहीं, बल्कि वैश्विक तेल बाजार में नई उथल‑पुथल का संकेत है, जो भारत जैसी आयात‑निर्भर अर्थव्यवस्थाओं को सीधे प्रभावित करेगा।

भारत के वित्तीय वर्ष 2025‑26 में पेट्रोल‑डिज़ेल सब्सिडी की बजट घोषणा, सॉलिड फ़्यूल प्राइस स्टेबिलिटी फंड (SFPSF) के तहत “स्थिर मूल्य” के दावे, और strategic petroleum reserves (SPR) के विस्तार के समुचित उपयोग पर सवाल उठते हैं। सरकारी spokespeople अक्सर कहते हैं कि भारत के पास “पेट्रोल की कीमतें नियंत्रण में” है, पर जब विदेश में लिटर में $1.70‑$2.00 के अंतर बन जाता है, तो ‘नियंत्रण’ का मापदंड कहाँ से लाना है?

विरोधी दल, विशेषकर कांग्रेस और AAP, यह तर्क दे रहे हैं कि केंद्र सरकार ने तेल आयात पर रणनीतिक योजना को पर्याप्त रूप से सुदृढ़ नहीं किया। उन्होंने पिछले दो वर्षों में SPR की भंडारण क्षमता में 30 % की कमी का हवाला देते हुए कहा, “किफ़ायती ईंधन का आश्वासन केवल चुनावी वादे रहे हैं, जब तक असली कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में उछलती रहती हैं।” उनके अनुसार, मौजूदा सब्सिडी मॉडल महंगाई को दबाने की बजाय “बजट में छेद बना रहा है” और “सांसदों के व्यक्तिगत लाभ को बढ़ा रहा है”।

न्यूरल नेटवर्क की स्थिति को देखते हुए, नीति निर्माताओं को दो‑तीन विकल्पों पर पुनर्विचार करना चाहिए: (i) Strategic Petroleum Reserve के उपयोग को तुरंत बढ़ाना, (ii) आयात‑कर एवं स्वैप‑ड्रॉ मॉडेल को लचीला बनाकर, (iii) वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों – इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बुनियादी ढाँचा और नवीनीकृत ऊर्जा के प्रोत्साहन को तेज़ करना। असल में, जब अमेरिकी कंज़्यूमर को पेट्रोल के लिए $4.48 देना पड़ता है, तो भारत की अर्थव्यवस्था में 1 % भी कच्चे तेल मूल्य में बदलाव के लिए महंगाई में 0.3‑0.4 % की वृद्धि हो सकती है, जो आम जन के जेब में सीधे असर डालती है।

अंततः, यह मामला सिर्फ तेल की कीमत नहीं, बल्कि शासन की जवाबदेही की परीक्षा है। “स्थिर मूल्य” कहने से पहले सरकार को यह सिद्ध करना होगा कि उसकी रणनीतिक आरक्षित, वित्तीय प्रबंधन और वैकल्पिक ऊर्जा की दिशा में उठाए कदम असुरक्षित अंतरराष्ट्रीय वातावरण में भी भारतीय ग्राहक को “किफ़ायती ईंधन” प्रदान कर सकते हैं। यदि नहीं, तो आगामी राज्य चुनावों में यह मुद्दा विरोधियों के पास एक सशक्त हथियार बन कर सामने आ सकता है।

Published: May 6, 2026