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Category: राजनीति

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अमेरिका की दोधारी नीति: हॉर्मुज खोलने के लिए यूएन से मदद, जबकि खुद बाधा बन गया

संयुक्त राज्य ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र को हॉर्मुज जलडरों को फिर से खोलने के लिए मदद माँगी है, जबकि पिछले महीनों में उसके द्वारा अपनाई गई कूटनीतिक और समुद्री कार्रवाई ने इस रणनीतिक मार्ग को अस्थायी रूप से प्रतिबंधित किया था। यह विरोधाभास न केवल अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग के लिए अस्थिरता पैदा करता है, बल्कि भारतीय ऊर्जा सुरक्षा पर भी गंभीर प्रश्न उठाता है।

रिपब्लिकन सांसद मारको रूबियो ने वार्ता के बीच में ही यूएन के हस्तक्षेप की माँग की, यह संकेत देते हुए कि अमेरिकी कूटनीति अब बहुपक्षीय मंच पर निर्भर करेगी। रूबियो का यह कदम अमेरिकी चुनावी वर्ष के निकट आ रहा है; उनके विचारों को घरेलू वोटरों को मजबूत करने और विदेश नीति में ‘दृढ़’ छवि पेश करने के दोहरे उद्देश्य से देखा जा रहा है।

आधिकारिक तौर पर, वाशिंगटन यह बताता है कि हॉर्मुज के खोलने से वैश्विक तेल बाजार की स्थिरता बनी रहेगी, परंतु उसी समय, अमेरिकी जहाज़ों की सैन्य उपस्थिति और इरान के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों ने समुद्री मार्ग को नुक़सान पहुँचाया। इस प्रकार की नीतियों को आम तौर पर ‘भयावह वैकल्पिकता’ के रूप में आलोचकां ने व्याख्या की है—पहले बंद कर, फिर अंतरराष्ट्रीय नागरिकता से खुलवाना।

भारत के लिए हॉर्मुज का महत्व अत्यधिक है; विश्व तेल की लगभग 20 % इस जलडर से गुजरती है, और भारत की तेल आयात पर निर्भरता यह मार्ग को रणनीतिक क्षेत्र बनाती है। हॉर्मुज में किसी भी अड़चन का तुरंत प्रभाव देश के डीजल, पेट्रोल और एरोवेटर फ्यूल की कीमतों पर पड़ता है, जिससे आम नागरिक को आर्थिक बोझ झेलना पड़ता है। भारत की विदेश नीति ने इस पर पारदर्शी संतुलन बनाने की कोशिश की है—इरान के साथ रूढ़िवादी संवाद जारी रखे, साथ ही तेल आयात में वैकल्पिक स्रोत बढ़ाए।

अमेरिका की इस दोधारी नीति से न सिर्फ यूएन की मध्यस्थता क्षमताओं पर सवाल उठते हैं, बल्कि बाइडेन प्रशासन की विदेश नीति में अखंडता की भी कमी स्पष्ट होती है। यदि अमेरिका अपने ही कार्यों से उत्पन्न संकट को फिर से सुलझाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संस्थानों पर निर्भर करता है, तो यह सच्चे नेतृत्व की जगह निर्णय‑परकता की कमी को उजागर करता है। प्रशासकीय जवाबदेही की इस घातक कमी से भारत सहित छोटे आयातकों को अंततः बोझ उठाना पड़ता है।

सारांश में, हॉर्मुज को खोलने के लिए यूएन को बुलाना अमेरिकी कूटनीति का वह कदम है, जिसमें पहले बाधा पैदा कर, फिर उसे हल करने की भूमिका सौंपना शामिल है। इस नीति‑विरोधाभास को भारत के ऊर्जा नियोजन और सुरक्षा पर दीर्घकालिक प्रभाव के साथ देखना आवश्यक है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जलडर पर अस्थिरता अंततः राष्ट्रीय अभ्यर्थी के रोज़मर्रा के जीवन को प्रभावित करती है।

Published: May 7, 2026